हॉंगकॉंग की अदालत ने तीन को जेल की सजा दी
शायद दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार था
इसकी सारी जानकारियों को दबाया गया
विरोध करने वालों को भी चुप कराया
हॉंगकॉंगः हाँगकांग की एक अदालत ने शुक्रवार को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अपराधों के तहत तियानमेन चौक नरसंहार की याद में कैंडल मार्च निकालने वाले तीन प्रमुख कार्यकर्ताओं को पाँच से सात साल के बीच की कैद की सजा सुनाई है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी निंदा की जा रही है। सजा पाने वालों में 69 वर्षीय ली चेउक-यान, 74 वर्षीय अल्बर्ट हो और 41 वर्षीय चाउ हांग-तुंग शामिल हैं, जो वर्ष 2021 में गिरफ्तारी के बाद से ही सलाखों के पीछे हैं और उनकी इस सजा में पहले ही काटी जा चुकी अवधि को भी शामिल किया जाएगा।
यह विवादास्पद फैसला उस राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत सुनाया गया है जिसे बीजिंग ने वर्ष 2020 में हांगकांग में बड़े पैमाने पर लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के बाद लागू किया था। अदालत ने अगस्त में फैसला सुनाया था कि इन कार्यकर्ताओं ने एक दलीय तानाशाही को समाप्त करने का आह्वान करके चीनी संविधान का उल्लंघन किया है।
सुनवाई के दौरान बिना जुर्म कबूल करने वाले ली और चाउ को क्रमशः सात वर्ष और सात वर्ष तीन महीने की सजा सुनाई गई, जबकि जनवरी में अपना जुर्म स्वीकार करने वाले पूर्व सांसद अल्बर्ट हो को पाँच साल दो महीने की कैद दी गई। हालांकि अदालत ने माना कि इस मामले में कोई हिंसा शामिल नहीं थी और आरोपियों ने तानाशाही खत्म करने के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की थी, फिर भी उनका यह अपराध गंभीर प्रकृति का था।
फैसला आने के बाद अदालत परिसर में मौजूद समर्थकों और परिजनों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जबकि पुलिस ने कड़े सुरक्षा घेरे बनाए रखे। तियानमेन चौक नरसंहार (4 जून 1989) के पीड़ितों के सार्वजनिक शोक और स्मरणोत्सव पर हाल के वर्षों में प्रतिबंध लगा दिया गया है। सजा पाने वाले ये तीनों नेता हांगकांग एलायंस के प्रमुख थे, जो हर साल विक्टोरिया पार्क में वार्षिक कैंडल लाइट Vigil का आयोजन करता था। इस फैसले के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क, यूरोपीय संघ, ताइवान और ह्यूमन राइट्स वॉच सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है और इन सजाओं को तुरंत रद्द करने की मांग की है। मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि यह सख्त कार्रवाई केवल राजनीतिक सक्रियता को दबाने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के उन पन्नों और यादों को मिटाने का प्रयास है जिसे सरकार लोगों के जेहन से दूर करना चाहती है।