संत रविदास के 650वें जयंती वर्ष पर भदोही बना ‘संत रविदास नगर’, सीएम योगी ने की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना
संत रविदास के 650वें जयंती वर्ष के ऐतिहासिक अवसर पर भदोही का नाम बदलकर ‘संत रविदास नगर’ करके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी उस दूरदर्शी दृष्टि को और विस्तारित किया है, जिसमें वे नामकरण को सांस्कृतिक पुनर्स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक समझते हैं और इसके लिए दलीय प्रतिबद्धताओं से भी आगे जाकर सोचते हैं।
भदोही के निवासियों के लिए भी यह बड़े गौरव की बात है, क्योंकि संत शिरोमणि रविदास की पावन संज्ञा मिलने के बाद अब यह पूरा जिला सामाजिक समरसता और समभाव के अग्रदूत के रूप में वैश्विक पटल पर दिखाई देगा। संत रविदास ने अपने युग में जाति और वर्ण के उन संकीर्ण बंधनों को सीधी चुनौती दी थी, जिनकी वजह से समाज का एक बड़ा वर्ग शिक्षा, समानता और सम्मान के अवसरों से वंचित था। उनके नाम पर जिले का पुनर्नामकरण इस बात का स्पष्ट प्रतीक है कि योगी सरकार जाति और वर्ण के आधार पर नहीं, बल्कि समभाव से ‘सबका साथ, सबका विकास’ के लिए संकल्पबद्ध है।
⚔️ वंचित और उपेक्षित वर्ग के लोकनायकों को समर्पित नाम, वीरांगनाओं व महाराजाओं को मिला राष्ट्रीय सम्मान
वस्तुतः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह प्रयास केवल मुगलकालीन या औपनिवेशिक नामों को हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन गुमनाम वीरांगनाओं और लोकनायकों को राष्ट्रीय स्मृति में पुनस्थापित करने का है, जिन्हें दशकों तक इतिहास की मुख्यधारा से बाहर रखा गया था।
उदाहरण के तौर पर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पासी समाज की महान वीरांगना ऊदा देवी के अदम्य साहस को सम्मान देते हुए योगी सरकार ने न केवल लखनऊ में उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित की, बल्कि एक महिला पीएसी बटालियन का नामकरण भी उनके नाम पर किया। इसी तरह झांसी की रानी की सेनानायिका झलकारी बाई (कोरी समाज) के नाम पर आगरा में और अवंती बाई (लोधी समाज) के नाम पर भी महिला पीएसी बटालियनें गठित की गईं। इसके अतिरिक्त, राजभर समाज के गौरव महाराजा सुहेलदेव के नाम पर भव्य स्मारक, पर्यटन परियोजनाएं और सांस्कृतिक आयोजनों का विस्तार किया गया, जिससे पूर्वांचल के समुदायों में एक नई पहचान व अस्मिता का भाव जागा है।
🛕 प्रयागराज और अयोध्या धाम से लेकर स्थानीय स्तर तक लौटाई गई पौराणिक आत्मा
प्रदेश के विविध सामाजिक समूहों को समान गरिमा देने की यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की विशिष्ट दृष्टि अन्य निर्णयों में भी साफ़ दिखाई देती है।
शाहजहांपुर के जलालाबाद का नाम भगवान परशुराम पुर, अयोध्या में खिलौनी-सुचितगंज को मां ज्वाला जी, कुशीनगर के फाजिलनगर को पावागढ़ और भदरसा को भरत नगर करना इसके उदाहरण हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो मुगलकाल में गाजीपुर, आजमगढ़, अलीगढ़, मुरादाबाद, इलाहाबाद, फिरोजाबाद और शाहजहांपुर जैसे अनेक बड़े जिलों का सुनियोजित सांस्कृतिक विस्थापन किया गया था। इलाहाबाद को पुनः ‘प्रयागराज’ और फैजाबाद को ‘अयोध्या धाम’ नाम देना वहां की आध्यात्मिक आत्मा को वापस लौटाने जैसा कदम है। स्वयं गोरखपुर में भी मुख्यमंत्री ने उर्दू बाजार का नाम हिंदी बाजार, हुमायूंपुर को हनुमान नगर, मियां बाजार को माया बाजार और अलीनगर को आर्य नगर में परिवर्तित कर स्थानीय जड़ों से जोड़ा है।
🔮 हरिगढ़, देववृंदपुर से लेकर कल्कि नगर तक: आगे भी कई शहरों के नाम बदलने की उठ रही है मांग
सनातन आस्था से जुड़े लोग स्वयं भी लंबे समय से ऐसे औपनिवेशिक या आक्रांता नामों से मुक्ति चाहते हैं जो उनकी ऐतिहासिक अस्मिता पर चोट करते हैं।
जनप्रतिनिधियों और स्थानीय जनता द्वारा संभल जिले के लिए कल्कि नगर या पृथ्वीराज नगर, अलीगढ़ को हरिगढ़ और देवबंद को देववृंदपुर करने की मांगें उठती रही हैं। जब कोई जागरूक समाज अपने नगरों को उनके पौराणिक, ऐतिहासिक या आस्था से जुड़े मूल नामों से पुकारना चाहता है, तो राज्य सरकार का दायित्व है कि वह जनभावनाओं को अनसुना न करे।
📈 “आत्मविश्वास से ही आता है विकास”: विपक्षी दलों के तर्कों का सीएम योगी ने दिया करारा जवाब
विपक्षी दल अक्सर यह तर्क देते हैं कि नामकरण की यह मुहिम शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
लेकिन यह तर्क तब पूरी तरह कमजोर पड़ जाता है जब हम देखते हैं कि सांस्कृतिक प्रतीक और विकास नीतियां साथ-साथ चल रही हैं। किसी भी समाज को यह गहराई से अनुभव कराना कि उसका इतिहास राष्ट्र के गौरव का मुख्य हिस्सा है, एक ऐसा अटूट आत्मविश्वास पैदा करता है जो आगे चलकर शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक भागीदारी में उस वर्ग की सक्रियता को कई गुना बढ़ा देता है।