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दस लाख साल पुरानी बर्फ से खुलेगा अतीत का राज, देखें वीडियो

अंटार्कटिका के वीरान इलाके में वैज्ञानिकों ने रचा इतिहास

आइस कोर: समय का प्राकृतिक कैप्सूल

मध्य-प्लेइस्टोसिन संक्रमण का रहस्य

भविष्य के जलवायु मॉडल के लिए ज़रूरी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः अंटार्कटिका के सबसे निर्जन और अत्यधिक ठंडे हिस्सों में से एक, डोम सी और लिटिल डोम सी के बर्फीले पठार पर वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इतिहास रच दिया है। बियॉन्ड ईपीआईसीए परियोजना के तहत शोधकर्ताओं ने बर्फ की लगभग 2.8 किलोमीटर (2,800 मीटर) गहराई से प्राचीन आइस कोर के नमूने ड्रिल करके बाहर निकाले हैं। माना जा रहा है कि इस बर्फ में करीब 10 से 15 लाख साल पुरानी वायुमंडलीय हवा के बुलबुले सुरक्षित कैद हैं।

बर्फ का यह विशाल भंडार सदियों से गिरती बर्फ के एक के ऊपर एक जमा होने और दबाव के कारण ठोस बर्फ में तब्दील होने से बना है। जब बर्फ जमा हो रही थी, तब उस समय की हवा के सूक्ष्म बुलबुले बर्फ की परतों के बीच फंस गए थे। वैज्ञानिक इन बुलबुलों को प्राकृतिक टाइम-कैप्सूल मानते हैं। प्रयोगशाला विश्लेषण के दौरान इन बुलबुलों को फोड़कर उनमें मौजूद प्राचीन कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के सांद्रण को ठीक उसी रूप में मापा जाता है, जैसा वह लाखों साल पहले वातावरण में मौजूद था।

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वैज्ञानिकों का मुख्य लक्ष्य मिड-प्लेइस्टोसिन ट्रांजिशन नाम की एक रहस्यमयी घटना को समझना है, जो लगभग 9 लाख से 12 लाख साल पहले घटित हुई थी। इस अवधि से पहले, पृथ्वी पर हर 40,000 साल में हिमयुग का चक्र बदलता था। लेकिन इस संक्रमण के बाद, यह चक्र अचानक बढ़कर हर 100,000 साल का हो गया और हिमयुग अधिक लंबे व ठंडे होने लगे।

ग्रह के कक्षीय गतियों में कोई बड़ा बदलाव न होने के बावजूद यह बदलाव क्यों आया, इसका जवाब वैज्ञानिक इस 10 लाख साल पुरानी हवा के सीओ2 और तापमान के आंकड़ों में खोज रहे हैं। प्राथमिक सिद्धांतों के अनुसार, वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में गिरावट इस जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह रही होगी।

वर्तमान में जब मानव निर्मित गतिविधियों के कारण पृथ्वी का तापमान और वायुमंडलीय सीओ 2 का स्तर ऐतिहासिक ऊंचाइयों को छू रहा है, तब यह समझना बेहद ज़रूरी हो जाता है कि अतीत में पृथ्वी की प्राकृतिक जलवायु प्रणाली ने प्राकृतिक कार्बन डॉईऑक्साइड उतार-चढ़ाव पर कैसी प्रतिक्रिया दी थी। यह खोज न केवल हमें हमारे ग्रह के गहरे जलवायु इतिहास की सटीक जानकारी देती है, बल्कि भविष्य में समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, वैश्विक तापमान और मौसम में होने वाले चरम बदलावों का सटीक अनुमान लगाने के लिए कंप्यूटर क्लाइमेट मॉडल्स को अधिक मजबूत और सटीक बनाती है।

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