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राजनीतिक सौदेबाजी और केंद्रीय एजेंसियों का खेल

भारतीय राजनीति में केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर बहस नई नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावी और चुनाव-बाद के घटनाक्रमों ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। चुनाव से ठीक पहले विपक्षी दलों की एकजुटता, अचानक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की सक्रियता, और फिर चुनाव नतीजों के बाद जांच की रफ्तार का रहस्यमयी तरीके से धीमा हो जाना—ये तमाम कड़ियाँ किसी सोची-समझी राजनीतिक पटकथा की ओर इशारा करती हैं।

यह पूरा घटनाक्रम इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे देश की शीर्ष जांच एजेंसियां अक्सर नीतिगत न्याय के बजाय राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का जरिया बनती दिखती हैं। यह सवाल वर्तमान में इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि फिलहाल राम मंदिर के चंदे की लूट के मुद्दे पर सभी केंद्रीय एजेंसियां चुप्पी साधे बैठी हैं वरना वे किसी विरोधी नेता अथवा सरकार के मामले में जरूरत से अधिक सक्रियता दिखाती हैं।

गैर करें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। तमाम भाजपा विरोधी दल अलग-अलग मुद्दों पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन इसी चुनावी गहमागहमी के बीच अचानक ईडी बेहद सक्रिय हो गई। इस सक्रियता का मुख्य केंद्र बिंदु बना आई-पैक का दफ्तर, जो तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूरे चुनावी कैंपेन और रणनीति को संभाल रहा था।

चुनावी तैयारियों के बीच किसी राजनीतिक दल की रणनीतिक रीढ़ पर छापा मारना एक बहुत बड़ा कदम था। इस छापामारी की खबर मिलते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आनन-फानन में वहां पहुंचना और कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज जबरन अपने साथ ले जाना, इस बात को साबित करता है कि मामला बेहद संवेदनशील था। उस वक्त ऐसा लगा था कि कोयला चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) का यह मामला टीएमसी सरकार और उसके नेतृत्व की जड़ें हिला देगा।

इस कार्रवाई ने तात्कालिक रूप से टीएमसी के कैंपेन को प्रभावित किया और विपक्षी खेमे में एक मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा कर दिया। असली कहानी चुनाव के नतीजों और टीएमसी की पराजय के बाद शुरू होती है। राजनीतिक विश्लेषकों को उम्मीद थी कि चुनाव के बाद केंद्रीय एजेंसियां इन मामलों को तार्किक परिणति तक पहुंचाएंगी, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट।

जो घटनाएं इसके बाद घटीं, वे किसी बड़े राजनीतिक समझौते या रणनीतिक खेल की गवाही देती हैं। जिस आई-पैक के निदेशक पर इतने गंभीर आरोप थे, उनकी जमानत का ईडी ने अदालत में कोई कड़ा विरोध नहीं किया। यह उस एजेंसी के चरित्र से मेल नहीं खाता जो आमतौर पर छोटे मामलों में भी जमानत का पुरजोर विरोध करती है।

टीएमसी के कई वरिष्ठ सांसद और विधायक अचानक ममता बनर्जी से दूरी बनाने लगे। यह दूरी वैचारिक नहीं, बल्कि एक अदृश्य डर या सुरक्षा की भावना से प्रेरित दिखाई दी। कई नेता जो कल तक मुखर थे, अचानक खामोश हो गए। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि कोयला चोरी और धन शोधन जैसे गंभीर राष्ट्रीय मामलों की जांच बीच रास्ते में ही थम गई।

आज तक इस बात का कोई विभागीय या आधिकारिक उत्तर नहीं मिला है कि आखिर वह जांच कहाँ तक पहुँची? करोड़ों रुपये के इस कथित घोटाले की फाइलें अचानक धूल क्यों फांकने लगीं? इस खामोशी ने जनता के मन में यह स्पष्ट संदेश दिया कि जांच का उद्देश्य कभी भी भ्रष्टाचार का खात्मा था ही नहीं। इन तमाम तथ्यों को जोड़ने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है—ईडी की इस पूरी कार्रवाई का मकसद केवल और केवल चुनाव को प्रभावित करना और राजनीतिक सौदेबाजी के लिए जमीन तैयार करना था।

चुनाव से पहले विपक्ष को डराना, उनकी चुनावी मशीनरी (आई-पैक) को पंगु बनाना और नेताओं को पाला बदलने के लिए मजबूर करना ही तात्कालिक लक्ष्य था। जैसे ही चुनाव संपन्न हुए और सत्ता समीकरणों के खेल पूरे हुए, वैसे ही एजेंसियों की ‘जरूरत’ भी खत्म हो गई। यदि यह वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई होती, तो जांच आज अपने मुकाम पर होती और दोषियों को सजा मिल चुकी होती।

लेकिन जांच का बीच रास्ते में रुक जाना यह साबित करता है कि एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को झुकाने और अपने अनुकूल माहौल बनाने के लिए एक हथियार के रूप में किया गया था। पश्चिम बंगाल का यह पूरा घटनाक्रम लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ जाता है।

जब देश की सर्वोच्च एजेंसियां देश के कानून के बजाय सत्ता के सियासी हितों के हिसाब से अपनी गति तय करने लगें, तो वह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक हो जाती है। परेशानी की बात यह है कि देश की जनता बहुत जल्द इन बीतों को भूल जाती है पर इन घटनाक्रमों के आधार पर जो बड़ी पटकथा लिखी जा रही है, उसे समझने लायक मानसिकता का विकास उनमें नहीं हो पाता। यह पहली बार है कि खुद भगवान राम ने सोए हुए हिंदुओँ को जगा दिया है।