भ्रष्टाचार का नया व्याकरण और सत्ता का मौन
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ नारे ऐसे होते हैं, जो एक युग को परिभाषित करते हैं। 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा का उद्घोष किया था, तो देश के एक बड़े वर्ग को लगा था कि अब भ्रष्टाचार का अंत निश्चित है। यह नारा केवल एक चुनावी जुमला नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रतिज्ञा की तरह पेश किया गया था।
लेकिन, एक दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद, जब हम आज के जमीनी यथार्थ का विश्लेषण करते हैं, तो यह नारा एक विडंबनापूर्ण सवाल बनकर खड़ा हो गया है। आज यह सवाल किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की अखंडता का है कि क्या सत्ता का आचरण कथनी और करनी के इस द्वंद्व में फंस चुका है?
ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा के नारे के बाद देश के कोने-कोने में भाजपा के आलीशान जिला कार्यालयों का निर्माण हुआ। इन कार्यालयों की भव्यता और उस पर हुए बेहिसाब खर्च ने कई अनुत्तरित प्रश्न खड़े किए। धन का स्रोत क्या था? इसका जवाब कभी सार्वजनिक पटल पर नहीं आया। जब चुनावी बॉन्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से खुला, तो यह स्पष्ट हो गया कि राजनीतिक चंदे की व्यवस्था में पारदर्शिता के बजाय गुमनामी को कानूनी जामा पहना दिया गया था। चुनावी बॉन्ड के जरिए सबसे अधिक धन प्राप्त करने वाली पार्टी के रूप में भाजपा का उभरना यह बताता है कि चंदे के इस खेल में क्विड प्रो को (कुछ के बदले कुछ) की संभावनाओं को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
भ्रष्टाचार का एक सूक्ष्म रूप आज राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में भी दिखाई दे रहा है। अरबों-खरबों रुपये खर्च करने के बाद भी सड़कों का निर्माण के कुछ ही समय बाद ध्वस्त हो जाना मात्र इंजीनियरिंग की विफलता नहीं है। यह सामग्री की गुणवत्ता में कटौती और ठेका प्रणालियों में व्याप्त भ्रष्टाचार का प्रतीक है।
वहीं, आम आदमी के स्तर पर देखें तो इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से इंजनों के खराब होने की खबरें लगातार आ रही हैं। नीतिगत स्तर पर लिए गए इन निर्णयों के पीछे की वैज्ञानिक तर्कशक्ति कम और औद्योगिक गठजोड़ की गंध अधिक आती है। आम जनता के वाहन और उसकी जेब दोनों इस विकास की कीमत चुका रहे हैं।
नीट यूजी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली के मामले ने युवा भारत के सपनों को तार-तार कर दिया है। यह केवल एक परीक्षा के लीक होने का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा तंत्र में व्याप्त उस दीमक का प्रमाण है, जो योग्यता की नींव को खोखला कर रहा है। जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा हो, तब सत्ता के गलियारों में सन्नाटा यह संदेश देता है कि शायद सिस्टम का अपराधीकरण अब अपवाद नहीं, बल्कि एक सामान्य घटना हो गई है।
ऐसे मामलों में मुख्य सरगनाओं पर कार्रवाई के बजाय छोटी मछलियों को पकड़कर मामले को रफा-दफा कर देना, सत्ता की नीयत पर सवालिया निशान लगाता है। हालिया समय में राम मंदिर जैसे संवेदनशील और आस्था से जुड़े विषय में दान के पैसों में हेरफेर की खबरें किसी झटके से कम नहीं हैं। यदि आस्था के केंद्रों में भी धन का दुरुपयोग हो रहा है, तो यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार अब नैतिक सीमाओं को भी लांघ चुका है।
इसके साथ ही, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सत्ता के करीब बैठे लोगों या मुख्यमंत्रियों के परिवारों द्वारा लगातार जमीन खरीद-फरोख्त के मामले भी सुर्खियों में हैं। सबसे बड़ा सवाल उन मुद्दों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी का है। जिस नेता ने स्वयं को प्रधान सेवक और भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा योद्धा पेश किया हो, उनका इन गंभीर विषयों पर मौन रहना क्या एक दोहरा आचरण नहीं है?
जब नारे देने वाले ही सवालों का सामना करने के बजाय चुप्पी साध लें, तो इसका अर्थ यही निकलता है कि व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव हो गया है। आज भ्रष्टाचार के स्वरूप बदल गए हैं; यह अब रिश्वत के लिफाफों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीतियों के निर्माण, चंदे के जटिल तंत्र और संस्थानों के मूकदर्शक बन जाने में निहित है।
ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा का नारा आज केवल एक ऐतिहासिक संदर्भ बन गया है, जिसकी प्रासंगिकता उन सवालों के बोझ तले दब गई है जो आज का नागरिक, अपनी टूटती उम्मीदों के साथ सत्ता से पूछ रहा है। अंततः, सत्ता की चमक-धमक और भव्य कार्यालयों के पीछे की असलियत वही होती है जो जनता के जीवन पर असर डालती है। यदि भ्रष्टाचार का यह नया व्याकरण इसी तरह अनियंत्रित रहा, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर के रूप में याद रखेंगी जहां जवाबदेही का गला घोंटकर विकास का मुखौटा पहनाया गया था।