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पैंतीस सौ करोड़ नकद और कोई हिसाब किताब नहीं

ऑडिट कंपनी की पूर्व रिपोर्ट रद्दी में डाल दी गयी थी

  • नवंबर 2020 की रिपोर्ट में चेतावनी

  • काम में कोई सुधार भी नहीं किया गया

  • अब तो सोना, चांदी और जवाहरात भी गायब

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के कुछ महीनों के भीतर ही, एक निजी ऑडिट फर्म ने इसकी कार्यप्रणाली को अत्यधिक गैर-पेशेवर करार दिया था। ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि दान प्राप्त करने और उनके प्रबंधन के लिए कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

यह चिंताजनक स्थिति आज छह साल बाद भी बरकरार है, जब ट्रस्ट पर दान के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लग रहे हैं। प्रारंभ में यह रकम छोटी समझी गयी थी लेकिन दिनोंदिन इसका आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। इतना ही नहीं अब तो सोना, चांदी और हीरे जवाहरात का भी हिसाब नहीं होने की शिकायत सामने आ गयी है।

मिली जानकारी के मुताबिक नवंबर 2020 में प्रस्तुत अपनी विस्तृत रिपोर्ट में, ऑडिट फर्म ने ट्रस्ट को यह स्पष्ट सुझाव दिया था कि लेनदेन, डेटा प्रबंधन, स्टाफ और अन्य संसाधनों के प्रत्येक स्तर पर जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक सिस्टमैटिक ऑपरेटिंग प्रोसेस तैयार करने की तत्काल आवश्यकता है। हालांकि, इतने महत्वपूर्ण सुझाव के बावजूद, प्रबंधन में सुधार के लिए अब तक कोई ठोस एसओपी लागू नहीं किया गया है।यानी ऑडिट फर्म की सिफारिश को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।

हाल ही में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, ट्रस्ट को अब तक करीब 3,500 करोड़ रुपये से अधिक की नकद राशि दान के रूप में प्राप्त हो चुकी है। इतनी विशाल धनराशि के प्रबंधन में एसओपी का अभाव वित्तीय अनियमितताओं की आशंकाओं को बल देता है। इसी संदर्भ में, मंगलवार को एक विशेष जांच दल ने उत्तर प्रदेश सरकार को अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी है।

ऑडिट फर्म ने अपनी रिपोर्ट में ट्रस्ट को सुझाव दिया था कि संस्था के कामकाज में पेशेवर दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है। यदि उस समय इन सुझावों को गंभीरता से लिया गया होता और एक व्यवस्थित कार्यप्रणाली अपनाई गई होती, तो शायद आज ट्रस्ट को इन आरोपों का सामना नहीं करना पड़ता। वर्तमान में SIT की जांच और दावों का मुद्दा ट्रस्ट की साख और उसकी दान प्रबंधन प्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। मामला अब कानूनी दायरे में है और उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी गई एसआईटी की रिपोर्ट इस पूरे विवाद में आगे की कार्रवाई की दिशा तय करेगी। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि धर्मार्थ संस्थाओं में दान के प्रबंधन के लिए सख्त वित्तीय मानकों और एक पारदर्शी प्रक्रिया का होना कितना अनिवार्य है, ताकि आम जनता की आस्था और उनके द्वारा दिए गए दान की पवित्रता बनी रहे। लेकिन अब तक इस बारे में कोई एफआईआर दर्ज नहीं होना भी संदेह पैदा कर रहा है।