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टीएमसी बगावत के पीछे निशिकांत दुबे का नाम

फिर विवादों में घिर गये भाजपा के गोड्डा सांसद

  • भूपेंद्र यादव के घर पर बैठक हुई थी

  • दक्षिण के एक और सांसद की चर्चा

  • महुआ मोइत्रा से 36 का आंकड़ा है

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी उथल-पुथल ने राष्ट्रीय राजनीति को गरमा दिया है। पार्टी के कई सांसदों के इस्तीफे और बागी सुरों के बीच, गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का नाम इस पूरे घटनाक्रम के मुख्य सूत्रधार के रूप में उभर कर सामने आया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि टीएमसी को तोड़ने और इसके संसदीय दल में विभाजन की पटकथा लिखने में दुबे की भूमिका केंद्रीय है।

इस ऑपरेशन की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले सप्ताह केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के आधिकारिक आवास पर टीएमसी के बागी सांसदों का जमावड़ा देखा गया था, और उसी बैठक के बाद से पार्टी छोड़ने वालों की कतार लग गई। अगले ही दिन, टीएमसी के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बारिक ने अपना इस्तीफा देने के बाद सीधे निशिकांत दुबे के दिल्ली स्थित आवास के बाहर मीडिया को संबोधित किया, जिसने इन चर्चाओं को और पुख्ता कर दिया।

जानकारों का कहना है कि निशिकांत दुबे इस पूरे घटनाक्रम में अकेले नहीं हैं; उनके साथ दक्षिण भारत के एक प्रभावशाली भाजपा सांसद भी पर्दे के पीछे से पूरी रणनीति संभाल रहे हैं। दुबे की कार्यशैली हमेशा से आक्रामक रही है। संसद में नेहरू-गांधी परिवार पर तीखे हमले हों या महुआ मोइत्रा के खिलाफ कैश-फॉर-क्वेरी का बहुचर्चित मामला—दुबे ने हमेशा भाजपा के लिए ट्रबलशूटर की भूमिका निभाई है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, निशिकांत दुबे की एक अनूठी विशेषता उनकी दलगत सीमाओं से परे व्यक्तिगत संबंध बनाने की क्षमता है। वे विपक्ष के कई सांसदों के बीच ऐसे व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं जो काम निकलवाने में माहिर हैं। हालाँकि, उनकी यह कार्यशैली कई बार पार्टी के भीतर और बाहर उनके विरोधियों को भी जन्म देती है। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के चुनावों में राजीव प्रताप रूडी के खिलाफ भाजपा के ही संजीव बालयान को समर्थन देकर उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वे राजनीतिक बिसात बिछाने में कितने कुशल हैं।

वर्तमान में, टीएमसी का एक बड़ा हिस्सा बगावत के मूड में है। सुष्मिता देव और सुखेन्दु शेखर रॉय जैसे वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। विपक्षी दल इसे ऑपरेशन लोटस की संज्ञा दे रहे हैं। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या निशिकांत दुबे की यह घेराबंदी तृणमूल कांग्रेस के लिए अस्तित्व का संकट बन जाएगी या ममता बनर्जी अपनी पार्टी को इस बड़े विभाजन से बचाने में सफल होंगी।