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सर्वोच्च न्यायालय का अरावली पर उच्च स्तरीय पैनल

पर्यावरण और प्रदूषण के मुद्दे पर विरोध अब भी जारी

  • कंचन देवी इसका नेतृत्व करेंगी

  • 31 अगस्त तक पैनल रिपोर्ट देगी

  • अनेक संगठनों की याचिका दायर है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र सरकार की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा करने के लिए एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। न्यायालय ने इस पैनल को केंद्र की रिपोर्ट में मौजूद उन गंभीर अस्पष्टताओं को हल करने का निर्देश दिया है, जो पर्यावरणीय संरक्षण के लिहाज से चिंता का विषय बनी हुई हैं। इस समिति का नेतृत्व भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद की महानिदेशक कंचन देवी करेंगी। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि समिति को सभी तकनीकी और भौगोलिक पहलुओं का गहन विश्लेषण कर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करनी होगी। इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए पैनल को 31 अगस्त, 2026 तक का समय दिया गया है।

यह कदम सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के कुछ महीने बाद उठाया गया है, जिसमें न्यायालय ने दिसंबर 2025 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा अक्टूबर 2025 में तैयार की गई रिपोर्ट के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी थी। न्यायालय का मानना है कि अरावली जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संरचना के सीमांकन में किसी भी प्रकार की त्रुटि या अस्पष्टता से पर्यावरण को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।

अरावली का संरक्षण न केवल जैव विविधता के लिए, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के राज्यों में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है। अब सबकी निगाहें इस विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि अरावली की आधिकारिक परिभाषा क्या होगी और इसके किन क्षेत्रों को संरक्षित की श्रेणी में रखा जाएगा। यह कदम अरावली के अवैध खनन और अतिक्रमण को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक पहल माना जा रहा है।