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Manuscript Conservation Campaign: खरगोन में शुरू हुआ पांडुलिपि संरक्षण अभियान; प्राचीन ज्ञान को डिजिटल रूप में सहेजने की अनूठी पहल

खरगोन: प्रदेश की संस्कृति, साहित्य और ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। सनातन ज्ञान परंपरा को हजारों वर्षों से हस्तलिखित पांडुलिपियों के जरिए संरक्षित किया गया है। हालांकि, समय, मौसम और उपेक्षा के कारण ये अमूल्य धरोहरें नष्ट होने की कगार पर हैं। इसी को देखते हुए खरगोन जिला प्रशासन ने ‘पांडुलिपि संरक्षण व डिजिटल अभिलेखीकरण अभियान’ शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य जिले में मौजूद ताम्रपत्रों, भोजपत्रों, प्राचीन धार्मिक पुस्तकों और वंशावलियों को सहेजकर उन्हें ‘ज्ञान भारतम्’ एप पर अपलोड करना है।

🛡️ क्या है पांडुलिपि संरक्षण अभियान का उद्देश्य?

जिला पुरातत्व समिति के सदस्यों के अनुसार, यह अभियान प्रशासन, पुरातत्व विभाग और स्थानीय विद्वानों के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य निजी परिवारों, मंदिरों और आश्रमों में सुरक्षित ऐतिहासिक दस्तावेजों का डिजिटलीकरण करना है ताकि भविष्य की पीढ़ियां इनसे शोध कर सकें और हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहे।

🔒 यह भ्रांति न पालें: दस्तावेज प्रशासन नहीं करेगा जब्त

अक्सर लोगों में यह डर होता है कि यदि वे अपने पास मौजूद दुर्लभ दस्तावेजों की जानकारी प्रशासन को देंगे, तो वे इन्हें जब्त कर लेंगे। नोडल अधिकारी नीरज अमझेरे ने स्पष्ट किया है कि प्रशासन कोई भी मूल दस्तावेज अपने अधिकार में नहीं लेगा। टीम केवल इनकी फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करेगी और यदि आवश्यक हुआ, तो उन्हें तकनीकी रूप से साफ कर संरक्षित रखने की विधि बताई जाएगी।

🔍 25 फीट लंबी जन्म पत्रिका और दुर्लभ संग्रह

इस अभियान के तहत टीम ने खरगोन के कई संग्राहकों से मुलाकात की। मीनल महाजन के पास से करीब 25 फीट लंबी हस्तलिखित जन्म पत्रिका और प्राचीन जैन ग्रंथ प्राप्त हुए हैं, जो पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन दस्तावेजों की जानकारी ‘ज्ञान भारतम्’ एप पर दर्ज की जाएगी, जिससे देश भर के शोधार्थियों की इन तक पहुंच आसान हो सकेगी।

⚠️ निजी स्तर पर सहेजने में चुनौतियां

प्राचीन पांडुलिपियों और ताम्रपत्रों को सहेजने में कई बाधाएं आती हैं:

  • नमी और मौसम का दुष्प्रभाव।

  • दीमक और कीटों से होने वाली क्षति।

  • संरक्षण तकनीक और डिजिटलीकरण का अभाव।

  • पीढ़ियों के बदलाव के साथ जागरूकता में कमी।

इसीलिए यह अभियान अत्यंत आवश्यक है, ताकि हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा को अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा जा सके।