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मार्को रुबियो नाटो की बैठक के लिए स्वीडन पहुंचे

बढ़ते मतभेदों के बीच सुलह की नई अमेरिकी कोशिश

एजेंसियां

वाशिंगटन: अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस सप्ताह एक बेहद महत्वपूर्ण राजनयिक मिशन पर स्वीडन की यात्रा पर हैं। वहाँ वे नाटो के विदेश मंत्रियों की उच्च स्तरीय बैठक में भाग लेंगे। इस बैठक का मुख्य एजेंडा सैन्य गठबंधन के भीतर अधिक जिम्मेदारी और वित्तीय भार साझा करने की तात्कालिक आवश्यकता पर चर्चा करना है। स्वीडन में अपनी द्विपक्षीय वार्ताओं को समाप्त करने के तुरंत बाद विदेश मंत्री रुबियो भारत के चार दिवसीय रणनीतिक दौरे पर रवाना होंगे।

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यह यात्रा बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में, नाटो और भारत दोनों के साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंध लगातार उतार-चढ़ाव और तनाव के दौर से गुजरते रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने अतीत में कई बार सार्वजनिक मंचों से इस ऐतिहासिक सैन्य गठबंधन से अमेरिका को बाहर निकालने की सख्त धमकी दी है। इसके अतिरिक्त, आर्थिक मोर्चे पर उन्होंने भारत से आने वाली वस्तुओं पर उच्च आयात शुल्क लगाकर व्यापारिक संबंधों में कड़े रुख का संकेत दिया है।

विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने आधिकारिक बयान में इस यात्रा की विस्तृत रूपरेखा साझा की है। उन्होंने बताया कि विदेश मंत्री रुबियो 22 मई को स्वीडन के हेलसिंगबोर्ग शहर में रुकेंगे। यहाँ होने वाली प्रमुख बैठकों में वे नाटो सहयोगियों के समक्ष रक्षा निवेश को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने और सुरक्षा व्यवस्था में सामूहिक वित्तीय योगदान सुनिश्चित करने की मांग को पुरजोर तरीके से उठाएंगे।

इसके साथ ही, रुबियो स्वीडन में आर्कटिक सेवन देशों के समूह—जिसमें कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और आइसलैंड शामिल हैं—के अपने समकक्ष विदेश मंत्रियों के साथ एक विशेष गोलमेज बैठक का हिस्सा बनेंगे। इस संवाद का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव के बीच साझा आर्थिक और सुरक्षा हितों की रक्षा करना तथा उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में रणनीतिक स्थिरता बनाए रखना है।

दरअसल, ट्रम्प प्रशासन लंबे समय से नाटो के सदस्य देशों की इस बात के लिए कड़ी आलोचना करता रहा है कि वे संयुक्त सैन्य अभियानों में तय मानकों के अनुरूप अपना वित्तीय योगदान नहीं दे रहे हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच यह कूटनीतिक खाई तब और चौड़ी हो गई जब यूरोपीय देशों ने ईरान संकट के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए अपने नौसैनिक जहाज भेजने के अमेरिकी अनुरोध को सिरे से खारिज कर दिया था।

इसके अलावा, डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को खरीदने के राष्ट्रपति ट्रम्प के पुराने और विवादित प्रस्ताव ने भी इस पश्चिमी गठबंधन के भीतर अविश्वास और मतभेदों को गहरा करने का काम किया है। ऐसे में रुबियो की यह यात्रा इन पुरानी कूटनीतिक दरारों को पाटने और अमेरिकी प्राथमिकताओं को मनवाने की एक बड़ी कोशिश है।