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1,600 से अधिक युद्धबंदियों की होगी सबसे बड़ी रिहाई

यमन सरकार और हूतियों के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ

एजेंसियां

मस्कट: यमन के विनाशकारी गृहयुद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित करते हुए, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमन सरकार और हूती विद्रोहियों ने एक व्यापक बंदी विनिमय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। जॉर्डन की राजधानी अम्मान में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में हुई इस उच्च-स्तरीय वार्ता ने 1,600 से अधिक बंदियों की रिहाई का मार्ग प्रशस्त किया है। सितंबर 2014 में संघर्ष शुरू होने के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कैदी विनिमय करार है।

इस समझौते के तहत मानवीय आधार पर कैदियों का आदान-प्रदान किया जाएगा। हूती विद्रोही अपने कब्जे से कुल 580 बंदियों को मुक्त करने पर सहमत हुए हैं। विशेष बात यह है कि इन बंदियों में केवल यमनी नागरिक ही नहीं, बल्कि सात सऊदी अरब और 20 सूडान के नागरिक भी शामिल हैं, जो क्षेत्रीय गठबंधन सेना का हिस्सा थे। इसके प्रत्युत्तर में, यमन सरकार 1,100 हूती कैदियों को रिहा करेगी। सरकारी वार्ता दल के उप प्रमुख याह्या कज़मान ने पुष्टि की कि इस सूची में वे राजनेता, सैन्य कर्मी और पत्रकार भी शामिल हैं, जो कई वर्षों से हूतियों की काल कोठरियों में कैद थे।

यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। इस समझौते की नींव ओमान की राजधानी मस्कट में हुई प्रारंभिक चर्चाओं के दौरान रखी गई थी, जिसे बाद में अम्मान में तीन महीने से अधिक समय तक चली गहन बातचीत के बाद अंतिम रूप दिया गया। रेड क्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति इस पूरे अभियान के कार्यान्वयन में मुख्य भूमिका निभाएगी। संगठन ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे उन परिवारों के लिए आशा की किरण बताया है, जो वर्षों से अपने प्रियजनों की वापसी का इंतजार कर रहे थे। समिति अब रिहाई की प्रक्रिया, परिवहन और रसद की योजना तैयार कर रही है।

यमन का गृहयुद्ध दुनिया के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में से एक माना जाता है, जिसने लाखों लोगों को विस्थापित किया और अकाल जैसी स्थितियाँ पैदा कीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता केवल कैदियों की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों पक्षों के बीच बढ़ते विश्वास का प्रतीक है। यदि यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी होती है, तो यह भविष्य में स्थायी संघर्ष-विराम और एक समावेशी राजनीतिक समाधान की दिशा में आधारशिला बन सकती है। फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस समझौते के जमीनी क्रियान्वयन पर टिकी हैं।