मनरेगा के कवरेज और कार्यदिवसों में भारी कमी
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः मनरेगा संघर्ष मोर्चा और लिबटेक इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के दायरे और पहुंच में वर्ष 2025-26 के दौरान भारी संकुचन देखा गया है। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौर में शुरू की गई इस योजना के अंतिम परिचालन वर्ष पर आधारित यह रिपोर्ट एक विरोधाभासी स्थिति दर्शाती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जहाँ पंजीकृत परिवारों की संख्या में मामूली वृद्धि हुई, वहीं काम पाने वाले परिवारों और श्रमिकों की संख्या में गिरावट आई है। साथ ही, कुल कार्य दिवसों में भी बड़ी कमी दर्ज की गई है और गारंटीकृत 100 दिनों का काम पूरा करने वाले परिवारों की संख्या भी घटी है। लिबटेक के अनुमान के अनुसार, इस गिरावट के कारण वित्त वर्ष के दौरान प्रत्येक मनरेगा परिवार को औसतन ₹1,221 की आय का नुकसान हुआ है।
अनिश्चित संक्रमण काल पिछले साल दिसंबर में संसद में पारित विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम 2025 जल्द ही लागू होने वाला है, जो मनरेगा का स्थान लेगा। केंद्र सरकार ने इस संक्रमण काल के लिए मनरेगा हेतु केवल 30,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने इस गिरावट पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि नई रोजगार योजना को बिना किसी सार्वजनिक परामर्श के लाया गया है। कार्यकर्ताओं ने सरकार से आग्रह किया है कि परिवर्तन की इस अवधि के दौरान रोजगार के अवसरों को बिना किसी बाधा के जारी रखा जाए।
आंकड़ों की बात करें तो योजना के तहत पंजीकृत परिवारों की संख्या 2024-25 में 14.98 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 15.46 करोड़ (3.2 फीसद वृद्धि) हो गई, लेकिन इससे रोजगार नहीं बढ़ा। पिछले वर्ष की तुलना में 44 लाख कम परिवारों और 67 लाख कम श्रमिकों को रोजगार मिला। कार्यक्रम के तहत उत्पन्न कुल कार्य दिवस 268.44 करोड़ से घटकर 210.73 करोड़ (21.5 प्रतिशत की गिरावट) रह गए। प्रति परिवार औसत कार्य दिवस भी 50.18 से घटकर 42.92 रह गए। सबसे बड़ी गिरावट 100 दिनों का काम पूरा करने वाले परिवारों में देखी गई, जिनकी संख्या 40.5% कम होकर 0.22 करोड़ पर आ गई।
भौगोलिक रूप से, 20 में से 15 राज्यों में कार्य दिवसों में गिरावट दर्ज की गई। तमिलनाडु में सबसे अधिक 42.8 फीसद की गिरावट रही, उसके बाद हरियाणा (41.7 फीसद), हिमाचल प्रदेश (41फीसद) और तेलंगाना (40.2 फीसद) का स्थान रहा। इसके विपरीत, झारखंड में कार्य दिवसों में सबसे अधिक 12.9 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई, जबकि जम्मू-कश्मीर और ओडिशा में भी मामूली सुधार हुआ। पश्चिम बंगाल में पिछले दो वर्षों से कोई कार्य दिवस उत्पन्न नहीं हुआ, इसलिए उसे विश्लेषण से बाहर रखा गया।