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भारत ने कहा लिपुलेख दर्रा की यात्रा प्राचीन काल से

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल की आपत्ति दरकिनार

  • जून में प्रारंभ होगी यह धार्मिक यात्रा

  • यह दर्रा यात्रा का दूसरा मार्ग घोषित है

  • नेपाल की आपत्ति का कोई आधार नहीं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा के आयोजन पर नेपाल द्वारा जताई गई आपत्ति को भारत ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस क्षेत्र पर काठमांडू का दावा न तो न्यायसंगत है और न ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। इससे पहले रविवार को ही नेपाल सरकार ने भारत और चीन दोनों को राजनयिक नोट भेजकर लिपुलेख दर्रे से गुजरने वाले तीर्थयात्रा मार्ग पर विरोध जताया था, जिसे नेपाल अपना क्षेत्र होने का दावा करता रहा है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर पौडेल छेत्री ने कहा था कि उनके देश की चिंताओं को राजनयिक माध्यमों से दोनों पड़ोसियों तक पहुँचा दिया गया है। इसके जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सीमा विवाद और पवित्र तीर्थयात्रा के संदर्भ में भारत की स्थिति को दोहराते हुए कहा कि इस मामले पर भारत का रुख हमेशा से सुसंगत और स्पष्ट रहा है। जायसवाल ने जोर देकर कहा, जहां तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत का निरंतर यह मानना रहा है कि ऐसे दावे न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। क्षेत्रीय दावों का इस तरह का एकतरफा और कृत्रिम विस्तार स्वीकार्य नहीं है।

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक स्थापित मार्ग रहा है और इस मार्ग से तीर्थयात्रा का आयोजन कोई नया घटनाक्रम नहीं है। यह यात्रा 2025 में भी इसी मार्ग से आयोजित की गई थी, जब वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे सैन्य गतिरोध के बाद भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य करने के प्रयासों के तहत पांच साल के अंतराल के बाद इसे फिर से शुरू किया गया था। भारत की ओर से यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि वह अपनी सीमाओं और पारंपरिक यात्रा मार्गों पर किसी भी निराधार दावे को स्वीकार नहीं करेगा।

इस वर्ष यह तीर्थयात्रा जून से अगस्त के बीच आयोजित होने वाली है। सरकार ने तीर्थयात्रियों की संख्या में वृद्धि करते हुए इसे 1,000 तक पहुँचा दिया है। योजना के अनुसार, 50-50 तीर्थयात्रियों के दस जत्थे उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से यात्रा करेंगे, जबकि इतने ही जत्थे सिक्किम के नाथू ला दर्रे के माध्यम से तिब्बत क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। नेपाल के साथ जारी इस कूटनीतिक तनाव के बावजूद, भारत यात्रा की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटा है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल द्वारा समय-समय पर उठाए जाने वाले ये क्षेत्रीय विवाद द्विपक्षीय संबंधों में जटिलता पैदा करते हैं, लेकिन भारत अपनी संप्रभुता और ऐतिहासिक अधिकारों को लेकर पूरी तरह अडिग है।