महिला आरक्षण: राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाम चुनावी रणनीति
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी हमेशा से एक विमर्श का विषय रही है। दशकों के संघर्ष के बाद जब 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ, तो देश की आधी आबादी को एक नई उम्मीद दिखाई दी थी। लेकिन हालिया घटनाक्रम और लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक का गिरना यह संकेत देता है कि महिला आरक्षण का मुद्दा नीतिगत प्रतिबद्धता से अधिक राजनीतिक शतरंज की बिसात बन गया है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना की शर्तों के साथ जोड़ना तार्किक है, या यह केवल इसे अनिश्चितकाल के लिए टालने की एक सोची-समझी रणनीति? विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह तर्क बेहद वजनदार है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन का इंतजार करने का कोई ठोस औचित्य नहीं है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं। यदि सरकार की मंशा साफ होती, तो मौजूदा सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल प्रभाव से लागू किया जा सकता था।
इसके लिए किसी नई जनगणना या निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन की तकनीकी आवश्यकता नहीं थी। जब 2023 में यह वादा किया गया था, तब इसे एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश किया गया। लेकिन इसमें परिसीमन की शर्त जोड़कर सरकार ने इसे एक ऐसी भूलभुलैया में डाल दिया, जिसका सिरा फिलहाल किसी के पास नहीं है।
परिसीमन का मुद्दा अपने आप में विवादित है, विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए, जिन्हें डर है कि जनसंख्या नियंत्रण के उनके सफल प्रयासों के कारण संसद में उनकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी। महिला आरक्षण जैसे पवित्र उद्देश्य को ऐसे जटिल और विवादित मुद्दे के साथ जोड़ना इसकी राह में जानबूझकर रोड़े अटकाने जैसा प्रतीत होता है। लोकसभा में जिस तरह से 131वां संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा, वह कई सवाल खड़े करता है।
संसदीय लोकतंत्र में सरकारें आमतौर पर इतने महत्वपूर्ण विधेयक तभी लाती हैं जब उन्हें संख्या बल का भरोसा हो। लेकिन यहाँ स्थिति कुछ और ही नजर आई। यह आरोप कि मोदी सरकार पहले से जानती थी कि बिल पास नहीं होगा, पूरी तरह निराधार नहीं लगता। विधेयक गिरने के तुरंत बाद जिस तरह से भाजपा की महिला सांसदों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया, उसने इस संदेह को गहरा कर दिया। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे विरोध की तैयारी पहले से ही थी।
यह किसी भी गंभीर पर्यवेक्षक को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह पूरी प्रक्रिया केवल एक पॉलिटिकल नैरेटिव सेट करने के लिए थी, ताकि इसका ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ा जा सके और आगामी चुनावों में इसे एक भावनात्मक मुद्दे के रूप में भुनाया जा सके। विपक्ष का रुख इस मुद्दे पर स्पष्ट और तार्किक रहा है। कांग्रेस, द्रमुक और अन्य क्षेत्रीय दलों ने बार-बार कहा है कि वे महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे इसके लागू होने के तरीके और समय पर सवाल उठा रहे हैं।
विपक्ष का सीधा प्रस्ताव है कि आरक्षण को वर्तमान सदस्य संख्या पर ही बिना किसी देरी के लागू किया जाए। 2023 के मूल वादे में बाद में नई शर्तें जोड़ना जनता के साथ विश्वासघात के समान है। यदि सरकार आरक्षण के प्रति गंभीर होती, तो वह विपक्ष के उस सुझाव को स्वीकार कर सकती थी जिसमें परिसीमन से स्वतंत्र होकर आरक्षण देने की बात कही गई थी।
लेकिन सरकार ने परिसीमन के साथ इसे जोड़कर एक ऑल और नथिंग (सब कुछ या कुछ नहीं) की स्थिति पैदा कर दी, जिससे अंततः नुकसान महिलाओं के प्रतिनिधित्व का ही हुआ। जमीनी हकीकत यह है कि पंचायत स्तर पर आरक्षण का लाभ लेकर लाखों महिलाएं सफल नेतृत्व कर रही हैं। समस्या नेतृत्व की क्षमता की नहीं, बल्कि संसद की दहलीज पर खड़ी उन बाधाओं की है जो कानूनी पेचीदगियों के नाम पर खड़ी की गई हैं। महिला आरक्षण केवल एक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का एक बड़ा उपकरण है।
इसे लागू करने के लिए किसी नए जनगणना के आंकड़ों या सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का इंतजार करना तर्कहीन है। यदि मंशा सही हो, तो मौजूदा ढांचे के भीतर ही महिलाओं को उनका हक दिया जा सकता है। सरकार को यह समझना होगा कि देश की महिलाएं अब प्रतीकात्मक राजनीति से संतुष्ट होने वाली नहीं हैं।
नारी शक्ति का नारा तभी सार्थक होगा जब वह संसद के भीतर सीटों के रूप में दिखाई देगा, न कि भविष्य की किसी अनिश्चित तारीख के वादे के रूप में। परिसीमन की बाधा को हटाकर और राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर ही इस गतिरोध को समाप्त किया जा सकता है। अन्यथा, यह बिल केवल चुनावी रैलियों का हिस्सा बनकर रह जाएगा और भारतीय संसद अपनी महिलाओं को उनका वाजिब हक देने में और कई दशक पीछे छूट जाएगी।