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बुर्किना फासो के सैन्य शासन में देश में कड़ाई की

सौ से अधिक गैर-सरकारी संगठनों का विघटन

एजेंसियां

औगाडूगूः पश्चिम अफ्रीकी देश बुर्किना फासो की सैन्य सरकार ने एक कड़ा कदम उठाते हुए 100 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों  और नागरिक समाज समूहों को भंग करने का आदेश दिया है। इस निर्णय को मानवाधिकार समूहों ने बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक सीधा हमला करार दिया है। क्षेत्रीय प्रशासन और गतिशीलता मंत्रालय ने बुधवार को आधिकारिक रूप से 118 संगठनों और संघों के विघटन की घोषणा की। सरकार का तर्क है कि यह कार्रवाई वर्तमान कानूनी प्रावधानों के अनुसार की गई है और इन सभी समूहों की गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया है।

यह घटनाक्रम बुर्किना फासो में चल रहे व्यापक दमन का नवीनतम हिस्सा है। इससे कुछ महीने पहले ही सैन्य सरकार ने एक डिक्री जारी कर देश के सभी राजनीतिक दलों को भंग कर दिया था। बुधवार को प्रतिबंधित किए गए ये सभी 118 संगठन बुर्किना फासो में ही स्थित हैं और इनमें से अधिकांश मानवाधिकारों की रक्षा और सामाजिक न्याय के कार्यों में सक्रिय रूप से संलिप्त थे। 2022 के तख्तापलट के बाद सत्ता संभालने वाले इब्राहिम त्रोरे के नेतृत्व वाली सैन्य सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में गैर-सरकारी संगठनों, यूनियनों, सभा करने की स्वतंत्रता और सैन्य शासन के विरोधियों पर लगातार शिकंजा कसा है।

जुलाई 2025 में राष्ट्रपति त्रोरे ने एक नया कानून पारित किया था, जिसने मानवाधिकार समूहों और सिंडिकेट्स के कामकाज पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। उस कानून के लागू होने के एक महीने के भीतर ही सरकार ने प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए 21 मानवाधिकार समूहों के अधिकार रद्द कर दिए थे और 10 अन्य को निलंबित कर दिया था। क्षेत्रीय प्रशासन मंत्री एमिल ज़र्बो ने नए प्रतिबंधित संगठनों के प्रमुखों को चेतावनी दी है कि वे जुलाई 2025 के कानून का पालन करें, अन्यथा उन्हें वर्तमान नियमों के तहत गंभीर दंड भुगतना होगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कार्रवाई की तीखी आलोचना हो रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के साहेल क्षेत्र के वरिष्ठ शोधकर्ता उस्मान डायलो ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह संघ बनाने की स्वतंत्रता के अधिकार पर एक प्रत्यक्ष प्रहार है। डायलो के अनुसार, गैर-सरकारी संगठनों को इस तरह भंग करना न केवल बुर्किना फासो के संविधान के विरुद्ध है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के साथ भी पूरी तरह से असंगत है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कदमों से देश में जवाबदेही खत्म हो जाएगी और सैन्य शासन के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबा दिया जाएगा।