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शेख हसीना की विदाई के मास्टरमाइंड कौन थे

अब  जाकर उजागर हो रहे हैं हर किस्म के साक्ष्य और साजिश

  • सावधानीपूर्वक तैयार की गई रणनीति
  • विदेशी फंडिंग और संस्थागत हस्तक्षेप
  • मोहम्मद युनूस ने थोड़ा संकेत दिया था

राष्ट्रीय खबर

ढाकाः बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन और उसके बाद हुए सत्ता परिवर्तन को लेकर अब नए और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। हालिया साक्ष्य, फंडिंग के विस्तृत आंकड़े और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए सार्वजनिक बयान यह संकेत देते हैं कि यह बदलाव केवल आंतरिक जन-असंतोष का परिणाम नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी बाहरी रणनीति का हिस्सा था। अब यह प्रश्न उठने लगा है कि जिसे लोकतांत्रिक क्रांति कहा गया, क्या वह वास्तव में एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई पॉलिटिकल इंजीनियरिंग थी?

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस का वह बयान है, जो उन्होंने क्लिंटन ग्लोबल इनिशिएटिव के एक कार्यक्रम में दिया था। बिल क्लिंटन की मौजूदगी में यूनुस ने उन युवाओं का परिचय “क्रांति के पीछे के दिमाग” के रूप में कराया, जिन्होंने इस पूरे आंदोलन को डिजाइन किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यूनुस के इस उत्साहपूर्ण खुलासे ने उस पर्दे को हटा दिया, जिसने इस आंदोलन को पूरी तरह जैविक या स्वतःस्फूर्त दिखाने की कोशिश की थी। संकेत मिलते हैं कि 17 साल पुरानी सरकार को हटाने के लिए अमेरिकी प्रतिष्ठान और ब्रिटेन के सहयोग से एक विस्तृत अभियान चलाया गया था।

आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024 में अमेरिका ने बांग्लादेश को 572 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता दी, जो अब तक का रिकॉर्ड स्तर है। इस फंड का एक बड़ा हिस्सा प्रशासन और शासन से जुड़ी हस्तक्षेप गतिविधियों के लिए आवंटित किया गया था। पिछले एक दशक में लगभग 325 मिलियन डॉलर के अनुदान इसी उद्देश्य से दिए गए। इसके अतिरिक्त, ब्रिटेन ने अपने पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन प्रोग्राम के जरिए लाखों पाउंड का निवेश किया।

फंडिंग का यह जाल केवल सरकारी स्तर तक सीमित नहीं था। डेमोक्रेसी इंटरनेशनल जैसे संगठनों को करोड़ों डॉलर दिए गए, जिन्होंने बांग्लादेश में राजनीतिक परिदृश्य को मजबूत करने के नाम पर एनजीओ और मीडिया आउटलेट्स का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया। ओपन सोसाइटी फाउंडेशन और संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाओं के माध्यम से भी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों और अधिकार समूहों को धन मुहैया कराया गया।

हसीना सरकार के जाने के तुरंत बाद, अमेरिकी दूतावास द्वारा ग्लोबल यूथ लीडरशिप सेंटर को दिए गए अनुदान ने इस संदेह को और पुख्ता किया है। इसका स्पष्ट उद्देश्य युवाओं के माध्यम से अंतरिम सरकार के सुधार एजेंडे और भविष्य की प्राथमिकताओं को प्रभावित करना था। यह दर्शाता है कि पहले से तैयार युवा नेटवर्क को न केवल विरोध के लिए इस्तेमाल किया गया, बल्कि उन्हें भविष्य के राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने के लिए भी लामबंद किया गया है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में यह स्थिति भारत जैसे पड़ोसी देशों के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय है।