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कोई गुप्त राजनीतिक लहर या केवर साख्यिकीय बदलाव

मध्य केरल में मतदान प्रतिशत में उछाल

राष्ट्रीय खबर

तिरुअनंतपुरमः केरल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए मध्य केरल में मतदान का दिन बेहद गहमागहमी भरा और सक्रिय भागीदारी वाला रहा। पिछले 2021 के चुनावों की तुलना में इस बार अधिकांश जिलों में मतदान के आंकड़ों में वृद्धि देखी गई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह बढ़ा हुआ प्रतिशत किसी सत्ता विरोधी लहर या विशेष राजनीतिक झुकाव का संकेत है, अथवा यह केवल मतदाता सूची के शुद्धिकरण के कारण हुआ एक सांख्यिकीय बदलाव है।

मध्य केरल के जिलों में मतदाताओं ने उत्साहपूर्वक अपने मताधिकार का प्रयोग किया। रात 9:00 बजे तक के आंकड़ों के अनुसार स्थिति इस प्रकार रही। एर्नाकुलम: 79.78 फीसद मतदान के साथ यह जिला पूरे क्षेत्र में शीर्ष पर रहा। विशेष रूप से, एर्नाकुलम के सभी 14 निर्वाचन क्षेत्रों में 2021 की तुलना में अधिक भागीदारी दर्ज की गई। इदुक्की: 77.14 फीसद, त्रिशूर: 77.09 फीसद और  कोट्टायम: 74.56 फीसद

निर्वाचन क्षेत्रों की बात करें तो कुन्नाथुनाड (83.96 फीसद) और त्रिपुनिथुरा (81.35 फीसद) में आश्चर्यजनक रूप से उच्च मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया है। इस बार के बढ़े हुए मतदान प्रतिशत के पीछे एक महत्वपूर्ण तकनीकी कारक स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन है। निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए गए इस अभियान के तहत मतदाता सूची से हजारों अनुपस्थित, स्थानांतरित और मृत  प्रविष्टियों को हटा दिया गया था।

इसका सीधा प्रभाव यह हुआ कि मतदाता सूची छोटी हो गई। जब कुल मतदाताओं की संख्या कम हो जाती है, तो भले ही डाले गए वोटों की वास्तविक संख्या न बढ़े, लेकिन कुल प्रतिशत काफी अधिक दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, कुन्नाथुनाड में मतदान प्रतिशत 82.93 फीसद (2021) से बढ़कर 83.96 फीसद हो गया, लेकिन वास्तविक मतों की संख्या में बहुत मामूली अंतर देखा गया है।

मतदान में इस उछाल का एक कारण तीन सप्ताह तक चला आक्रामक चुनाव प्रचार भी माना जा रहा है, जिसमें राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की मौजूदगी और तीखी वैचारिक बहसें शामिल थीं। कुन्नाथुनाड जैसे क्षेत्रों में त्रिकोणीय मुकाबले ने भी मतदाताओं को घरों से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, निर्वाचन आयोग के शुरुआती आंकड़ों से एक सूक्ष्म तस्वीर उभरती है।

कई निर्वाचन क्षेत्रों में वास्तविक वोटों की गिनती 2021 के स्तर के आसपास ही है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह किसी बड़ी राजनीतिक लहर का परिणाम है। विशेषज्ञों का मानना है कि दुबली मतदाता सूची और बेहतर जागरूकता ने प्रतिशत को तो ऊपर उठा दिया है, लेकिन असली फैसला 4 मई को मतपेटी खुलने पर ही स्पष्ट होगा।