नेतन्याहू की राजनीतिक मंशा दांव पर लगी
एजेंसियां
तेल अवीवः जैसे-जैसे ईरान के साथ युद्ध अपने दूसरे महीने में प्रवेश कर रहा है, इजरायली समाज की वह अभूतपूर्व एकजुटता, जो संघर्ष के शुरुआती दिनों में देखी गई थी, अब गंभीर दबाव के घेरे में आने लगी है। इस सप्ताह की शुरुआत में, जब पूरा इजरायल पासओवर के पवित्र त्योहार की तैयारियों में जुटा था, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने राष्ट्र के नाम एक अत्यंत आक्रामक और कूटनीतिक रूप से कड़ा संबोधन दिया। अपने भाषण को प्रभावशाली बनाने के लिए उन्होंने प्राचीन यहूदी इतिहास और धार्मिक ग्रंथों (बाइबिल) के उन संदर्भों का भरपूर उपयोग किया, जो सदियों से दुश्मनों पर यहूदियों की विजय के प्रतीक रहे हैं।
नेतन्याहू ने वर्तमान सैन्य कार्रवाई की तुलना उन दस विपत्तियों से की, जिनके बारे में मान्यता है कि ईश्वर ने प्राचीन काल में इजरायलियों को मिस्र की दासता से मुक्त कराने के लिए वहां के शासकों पर बरसाई थीं। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह दावा किया कि इजरायल की सैन्य शक्ति ने न केवल ईरान को चुनौती दी है, बल्कि पूरे मध्य पूर्व के परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया है। प्रधानमंत्री का यह संबोधन स्पष्ट रूप से देश के भीतर राष्ट्रवाद की भावना को फिर से प्रज्वलित करने और युद्ध के प्रति घटते जन समर्थन को एकजुट करने का एक रणनीतिक प्रयास था।
हालांकि, नेतन्याहू का यह विजय उद्घोष अधिक समय तक टिक नहीं सका। उनके भाषण के कुछ ही घंटों बाद, ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इस संघर्ष का अब तक का सबसे भीषण और व्यापक हमला बोल दिया। मिसाइलों और ड्रोनों की भारी गोलाबारी ने न केवल त्योहार के उल्लासपूर्ण माहौल को दहशत में बदल दिया, बल्कि प्रधानमंत्री की पूर्ण विजय वाली बयानबाजी और युद्ध के मैदान की कड़वी हकीकत के बीच मौजूद गहरी खाई को भी जगजाहिर कर दिया।
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान में शुरू किए गए इस सैन्य अभियान को अब 38 दिन से अधिक का समय बीत चुका है। लगातार होते जा रहे घातक पलटवारों और युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका ने इजरायली जनता के बीच एक अनिश्चितकालीन असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह युद्ध इसी तरह बिना किसी स्पष्ट अंत के जारी रहा, तो सरकार की सैन्य और राजनीतिक रणनीतियों पर जनता का भरोसा पूरी तरह डगमगा सकता है। इजरायल के भीतर अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह युद्ध केवल बाहरी मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि आंतरिक सामाजिक सामंजस्य के मोर्चे पर भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।