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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर प्रस्ताव खारिज

चुनाव से ठीक पहले विपक्ष को लगा जोरदार झटका

  • 193 सांसदों ने नोटिस दिया था

  • सात गंभीर आरोप लगाये गये थे

  • विपक्ष ने पक्षपात का आरोप मढ़ा

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारतीय संसदीय इतिहास में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के तहत, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए विपक्ष द्वारा लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को तकनीकी और संवैधानिक आधारों पर खारिज कर दिया है। यह पहली बार है जब भारत के किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में इतने व्यापक स्तर पर औपचारिक नोटिस दिया गया था।

लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी विस्तृत अधिसूचना के अनुसार, 12 मार्च 2026 को विपक्ष के 130 लोकसभा सदस्यों ने एक हस्ताक्षरित नोटिस अध्यक्ष को सौंपा था। इसके साथ ही राज्यसभा में भी 63 सांसदों ने इसी तरह का नोटिस सभापति को दिया। यह नोटिस संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत दिया गया था, जो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान (अनुच्छेद 124(4) के अनुसार) निर्धारित करता है।

प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 तथा न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 का हवाला देते हुए ज्ञानेश कुमार पर पद के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत अपनी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग करते हुए कहा कि नोटिस में लगाए गए आरोपों में पर्याप्त न्यायिक आधार की कमी है, जिसके चलते इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

विपक्ष द्वारा प्रस्तुत 10 पृष्ठों के आरोप-पत्र में ज्ञानेश कुमार पर सात मुख्य आरोप लगाए गए थे। इनमें सबसे प्रमुख विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया में कथित अनियमितता थी। विपक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया गया है।

विपक्षी दलों, विशेष रूप से तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सीईसी का आचरण सत्ताधारी दल के प्रति झुकाव वाला रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे वोट चोरी अभियान का नाम दिया, जबकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में चल रही एसआईआर प्रक्रिया को मनमाना और भाजपा को लाभ पहुँचाने वाला करार दिया।

प्रस्ताव के खारिज होने के बाद राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। टीएमसी के सांसदों ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का गला घोंटने जैसा बताया है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने इस प्रस्ताव को संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की एक हताश कोशिश करार दिया। भाजपा नेताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है और चुनावी हार के डर से विपक्ष जानबूझकर उस पर कीचड़ उछाल रहा है।