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भरोसा दिला दें कि एपस्टीन फाइल नहीं खुलेगी

2026 की दहलीज पर खड़ा विश्व एक ऐसे चौराहे पर है, जहाँ युद्ध की विभीषिका केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि हर आम आदमी की जेब और वैश्विक बाजार की धमनियों तक पहुँच गई है। ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरोधाभासी बयानों ने न केवल कूटनीतिक गलियारों में भ्रम पैदा किया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक ऐसे अनिश्चित भविष्य की ओर धकेल दिया है, जिसका बोझ उठाने में दुनिया फिलहाल सक्षम नहीं दिखती।

राष्ट्रपति ट्रंप की विदेश नीति हमेशा से अनिश्चितता के सिद्धांत पर आधारित रही है। हाल के हफ्तों में उनके बयानों में आया बदलाव इस बात का प्रमाण है। एक तरफ जहाँ वे मार-ए-लागो से यह घोषणा करते हैं कि ईरान की सैन्य क्षमताएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं और मिशन पूरा होने के करीब है, वहीं अगले ही दिन व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस से वे ईरान को पत्थर युग में भेजने की धमकी देते नजर आते हैं।

इस युद्ध की सबसे भयावह तस्वीर इसके वित्तीय आंकड़ों में छिपी है। विश्लेषणों के अनुसार, ईरान के खिलाफ चल रहे इस सैन्य अभियान में अमेरिका प्रति दिन 1.2 बिलियन डॉलर (लगभग ₹10,000 करोड़) से अधिक खर्च कर रहा है। युद्ध के पहले 100 घंटों में ही अमेरिका ने 5.2 बिलियन डॉलर के गोला-बारूद और ईंधन का उपयोग कर लिया था।

यह केवल बमों और मिसाइलों का खर्च नहीं है। मध्य पूर्व में तैनात विमानवाहक पोतों, हज़ारों की संख्या में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और पैट्रियट जैसी महंगी मिसाइल प्रणालियों (जिनकी एक मिसाइल की कीमत $4 मिलियन से अधिक है) का रखरखाव अमेरिकी बजट पर भारी पड़ रहा है। ट्रंप प्रशासन अब कांग्रेस से $1.5 ट्रिलियन के रिकॉर्ड रक्षा बजट की मांग कर रहा है।

विडंबना यह है कि जिस अमेरिका में बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवा पर निवेश की मांग हो रही है, वहां का धन सत्ता परिवर्तन की अंधी दौड़ में झोंका जा रहा है। ईरान युद्ध का सबसे खतरनाक आर्थिक हथियार होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 फीसद इसी संकरे रास्ते से गुजरता है।

मार्च 2026 में ईरान द्वारा इसे बंद किए जाने के बाद से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमरा गई है। विश्व व्यापार संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि यह तनाव जारी रहा, तो 2026 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 0.3 प्रतिशत से 1 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है। विशेष रूप से भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देश, जो खाड़ी के तेल पर अत्यधिक निर्भर हैं, इस समय एनर्जी इन्फ्लेशन (ऊर्जा मुद्रास्फीति) की चपेट में हैं।

अमेरिका में भी गैस की कीमतें $4 प्रति गैलन के पार पहुँच गई हैं, जिससे वहां भी घरेलू असंतोष बढ़ रहा है। युद्ध ने केवल तेल ही नहीं, बल्कि उर्वरक और खाद्य रसद को भी प्रभावित किया है। वैश्विक मुद्रास्फीति दर इस समय 7.7 फीसद के करीब पहुँच रही है, जो 2022 के संकट की याद दिलाती है। जब ऊर्जा महंगी होती है, तो परिवहन और विनिर्माण की लागत बढ़ती है, जिसका सीधा असर ब्रेड से लेकर स्मार्टफोन तक हर चीज की कीमत पर पड़ता है। गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि यदि अप्रैल के अंत तक युद्ध समाप्त नहीं हुआ, तो कुवैत और कतर जैसे देशों की जीडीपी में 14 फीसद तक की गिरावट आ सकती है, जबकि विकसित देश एक गहरी मंदी की ओर बढ़ेंगे।

अब विचार करते हैं कि अचानक डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के युद्ध का मोर्चा क्यों खोला। इससे पहले दरअसल एपस्टीन फाइलों ने दुनिया के शीर्ष नेताओँ और व्यापारियों की नींद उड़ा दी थी। युद्ध के बाद अब कोई इसकी चर्चा नहीं कर रहा है। इससे एक लीक तो स्पष्ट होती है। कई बड़े विकेट इस चर्चा में गिर भी चुके हैं। लिहाजा यह समझा जा सकता है कि शायद ईरान युद्ध भी इस मुद्दे की तरफ से ध्यान हटाने का एक आजमाया हुआ तरीका है।

पाकिस्तान के जरिए युद्धविराम संबंधी चर्चा के बीच दुनिया को इस पर भी विचार करना चाहिए कि दुनिया इस बात के लिए डोनाल्ड ट्रंप को आश्वस्त करे कि भविष्य में उनकी तरफ से एपस्टीन फाइल पर खुलासे की मांग नहीं की जाएगी। इससे कमसे कम उनके अमेरिका फर्स्ट नीति के पीछे छिपा उनका एक भय तो कम होगा और अमेरिका में निकट आ रहे मध्यावधि चुनाव में वह थोड़ा साहस भी महसूस करेंगे। वरना अभी वह जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे उनकी मानसिक स्थिति पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक हो चुका है।