आजकल वैश्विक राजनीति के रंगमंच पर व्हाइट हाउस वाले डोनाल्ड ट्रंप साहब का चेहरा देखकर ऐसा लगता है मानो उन्होंने गलती से मीठी चाशनी की जगह कड़वा नीम का काढ़ा पी लिया हो। ट्रंप साहब की दुविधा बिल्कुल वैसी ही है, जैसी किसी शादी में उस फूफा की होती है जिसे पनीर की सब्जी में कम पनीर दिखने पर गुस्सा तो बहुत आता है, लेकिन सामने वाले समधी के पास परमाणु बम जैसी रसूख देखकर वे मन मसोसकर रह जाते हैं।
ट्रंप साहब ने गरजते हुए कहा था कि ईरान को पत्थर युग में भेज देंगे, पर फिलहाल तो आलम यह है कि उनके अपने मित्र देश उन्हें पाषाण युग का अकेला योद्धा मानकर कन्नी काट रहे हैं। नाटो वाले दोस्त आजकल फोन नहीं उठा रहे और खाड़ी के देश ऐसे मुस्कुरा रहे हैं जैसे उन्हें पता हो कि ट्रंप साहब की कश्ती वहीं डूबेगी जहाँ पानी (यानी तेल) सबसे गहरा है। ऊपर से ईरान वाले हैं कि उनके स्टील्थ विमानों को ऐसे मार गिरा रहे हैं जैसे गांव के मेले में एयरगन से गुब्बारे फोड़े जाते हों। ट्रंप साहब आसमान की ओर देख कर सोच रहे हैं कि अदृश्य विमान अगर दिखने लगे, तो फिर साख कैसे बचेगी?
इधर सात समंदर पार हमारे देश में भी चुनावी बयार नहीं, बल्कि लू चल रही है। कई राज्यों में चुनावी बिसात बिछी है। नेताजी लोग हाथ जोड़कर गली-गली घूम रहे हैं, लेकिन जनता का ध्यान उनके वादों से ज्यादा अपनी गाड़ी के फ्यूल गेज पर है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान ने जो नाकेबंदी की है, उसने हमारे यहाँ रसोई गैस और पेट्रोल की कीमतों में वह आग लगाई है कि अब तो गृहणियां लाइटर की जगह माचिस जलाने से भी डरती हैं।
सरकार रोज सुबह उठकर सफाई देती है— भरोसा रखिए, तेल की कोई किल्लत नहीं है। लेकिन जनता का भरोसा उस पुराने स्कूटर जैसा हो गया है जो कितनी भी किक मारो, स्टार्ट होने का नाम नहीं लेता। लोग पेट्रोल पंप पर लंबी कतारों में खड़े होकर एक-दूसरे का मुंह ताकते हैं। चुनावी रैलियों में जब नेताजी विकास का नारा लगाते हैं, तो पीछे से कोई आवाज आती है— साहब, विकास तो ठीक है, बस थोड़ा डीजल मिल जाता तो घर चले जाते!
इसी अफरा-तफरी और वैश्विक अमवा (असमंजस) के बीच, आज के दौर का आम आदमी, जो वैश्विक राजनीति की चक्की में पिस रहा है और घरेलू महंगाई की आग में झुलस रहा है, वह रेडियो पर बजते उस पुराने नगमे को सुनकर ठिठक जाता है। उसे लगता है कि शायद यह गाना आज के ट्रंप साहब और हमारे यहां के मध्यमवर्गीय मतदाता, दोनों की अंतरात्मा की आवाज है:
फिल्म छोटी बहन के इस गीत के गीतकार हसरत जयपुरी, संगीतकार शंकर-जयकिशन थे। इसे मुकेश कुमार ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं
जाऊं कहां बता ऐ दिल, दुनिया बड़ी है संगदिल
चांदनी आई घर जलाने, सूझे न कोई मंजिल
जाऊं कहां बता ऐ दिल…
बस्ती में आए बेगाने, बेगाने रह गए हम अपने थे
जो कल तक, अनजाने रह गए
हम अपनी ही गली में आज हम,
हो गए कातिल के काबिल
जाऊं कहां बता ऐ दिल…
तूने ही मुझको राह दिखाई,
तूने ही राह छुड़ाई तू ही मेरे संग चला था,
तूने ही आग लगाई कैसी डगर है प्यार की,
जिसमें न राही न मंजिल
जाऊं कहां बता ऐ दिल…
जीवन के इस उजले पथ पर,
छाया क्यों मँडराई जिसमें फँसकर
आज हमारी, अपनी जान पर आई
तू भी तो मेरा साथ दे,
ऐ मेरे टूटे हुए दिल
जाऊं कहां बता ऐ दिल…
यहाँ चुनावी राज्यों में मुफ्त बिजली-पानी के वादे धुंआ होने लगते हैं। जनता भी बड़ी संगदिल हो गई है। वह जानती है कि चुनाव के बाद नेताजी और ईरान का तेल, दोनों ही स्टील्थ मोड में चले जाएंगे— यानी दिखेंगे नहीं, बस उनके होने का एहसास होगा।
सरकार की सफाई का असर अब इसलिए नहीं होता क्योंकि लोगों ने देख लिया है कि जब-जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ता है, तब-तब यहाँ तवा (रसोई का) ठंडा होने लगता है। तेल की किल्लत पर सरकार कहती है, हम रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल करेंगे। जनता सोचती है, साहब, भंडार तो ठीक है, पर क्या वह मेरे घर के पास वाले पंप तक पहुंचेगा या सिर्फ आंकड़ों की फाइलों में ही तैरेगा?
चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें सफाई देती रहेंगी और ट्रंप साहब शायद अगले हफ्ते फिर कोई नई कसम खाएंगे। लेकिन इस सबके बीच जो पिसा जा रहा है, वह है वह आदमी जिसे न यूरेनियम संवर्धन से मतलब है, न मिडटर्म इलेक्शन से। उसे मतलब है उस गैस चूल्हे से जिस पर दाल पकनी है। अंत में, चाहे वाशिंगटन हो, तेहरान हो या पश्चिम बंगाल की कोई चुनावी गली— हर जगह एक ही धुन सुनाई दे रही है।