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मंगोलिया के प्रधानमंत्री जाव का अचानक इस्तीफा

सत्तारूढ़ दल के भीतर तनाव के बाद  अस्थिर राजनीति का दौर

उलानबटोर: मध्य एशिया के लोकतांत्रिक राष्ट्र मंगोलिया में एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के तहत प्रधानमंत्री ज़ंदनशतर गोम्बो जाव ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा सत्तारूढ़ मंगोलियन पीपुल्स पार्टी के भीतर पनप रहे आंतरिक असंतोष और विपक्षी दलों द्वारा संसद के बढ़ते घेराव का परिणाम माना जा रहा है। मंगोलियाई संसद (ग्रेट स्टेट खुराल) ने औपचारिक रूप से उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है, जिससे देश में नए नेतृत्व की राह साफ हो गई है।

मंगोलिया में पिछले कुछ हफ्तों से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना हुआ था। मुख्य विपक्षी दल, डेमोक्रेटिक पार्टी, ने इस महीने की शुरुआत में संसदीय कार्यवाही का पूर्ण बहिष्कार कर दिया था। विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ दल लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है और सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण कर रहा है।

राजनीतिक दबाव तब और बढ़ गया जब न्याय मंत्री एंखबयार बत्तूमुर के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए। बत्तूमुर को निवर्तमान प्रधानमंत्री ज़ंदनशतर का बेहद करीबी सहयोगी माना जाता है। हालांकि, स्वयं प्रधानमंत्री ज़ंदनशतर पर सीधे तौर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है, लेकिन अपने कैबिनेट सहयोगियों पर लगे दाग और पार्टी के भीतर उनके बचाव को लेकर उपजे असंतोष ने उनकी स्थिति को कमजोर कर दिया।

अपने विदाई संदेश में ज़ंदनशतर ने सोशल मीडिया के माध्यम से जनता को संबोधित किया। उन्होंने चेतावनी दी कि राजनीतिक अस्थिरता और “आंतरिक कलह” का सीधा असर देश की नाजुक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक खींचतान के कारण निवेश रुक सकता है, जिससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी और आम नागरिक का जीवन कठिन हो जाएगा। जून 2025 से पद संभालने वाले ज़ंदनशतर का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा, जो मंगोलिया की राजनीति में सरकारों के अल्पकालिक होने की प्रवृत्ति को फिर से रेखांकित करता है।

संसद द्वारा इस्तीफे की पुष्टि के बाद, अब पार्टी अध्यक्ष न्याम-ओसोरिन उचराल के अगले प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने की प्रबल संभावना है। उचराल वर्तमान में संसद के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं और उन्हें पार्टी के भीतर एक युवा और प्रभावी नेता के रूप में देखा जाता है।

मंगोलिया की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तांबे और कोयले जैसे खनन उत्पादों के निर्यात पर टिकी है, जिसके लिए वह अपने पड़ोसी देश चीन पर अत्यधिक निर्भर है। बार-बार होने वाले नेतृत्व परिवर्तन और बदलते नियामक ढांचों ने विदेशी निवेशकों के मन में हमेशा से संदेह पैदा किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस ताजा उथल-पुथल से ओयू तोल्गोई जैसे बड़े खनन प्रोजेक्ट्स और भविष्य के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर अनिश्चितता के बादल मंडरा सकते हैं।