वैज्ञानिकों ने पायी हृदय रोग विज्ञान में क्रांतिकारी सफलता
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शोध का मुख्य आधार और प्रक्रिया
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रिजेनेरेटिव दवा की दिशा में सफलता
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परीक्षण के परिणाम और भविष्य की राह
राष्ट्रीय खबर
रांचीः चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में 20 मार्च 2026 की तारीख एक मील का पत्थर साबित हुई है। कार्डियोलॉजी (हृदय विज्ञान) के क्षेत्र में काम कर रहे शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में हार्ट अटैक के बाद होने वाली मौतों और ‘हार्ट फेलियर’ की समस्या को जड़ से समाप्त कर सकती है। यह तकनीक मैसेंजर आरएनए पर आधारित है, जिसका सफल प्रयोग हमने कोविड-19 टीकों के दौरान देखा था।
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लंबे समय से वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मानव हृदय की मांसपेशियां चोटिल होने या हार्ट अटैक के बाद खुद को पुनर्जीवित नहीं कर पातीं। जब हृदय की कोशिकाओं को ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो वे मर जाती हैं और वहां ‘स्कार टिश्यू’ (घाव के निशान) बन जाते हैं, जिससे दिल कमजोर हो जाता है।
हालिया शोध में, वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रकार का एम आरएनए इंजेक्शन तैयार किया है। यह इंजेक्शन सीधे हृदय की मांसपेशियों में जाकर उन प्रोटीनों को सक्रिय करता है, जो कोशिका विभाजन के लिए जिम्मेदार होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, यह इंजेक्शन हृदय को यह निर्देश देता है कि वह अपनी मृत कोशिकाओं के स्थान पर नई और स्वस्थ कोशिकाएं पैदा करे।
चूहों और सूअरों पर किए गए हालिया परीक्षणों में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। इंजेक्शन दिए जाने के मात्र 48 घंटों के भीतर, परीक्षण किए गए जीवों के हृदय की कार्यक्षमता में 25 से 30 प्रतिशत तक का सुधार देखा गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस प्रक्रिया में हृदय की संरचना में कोई नकारात्मक बदलाव नहीं आया।
यह तकनीक न केवल हार्ट अटैक के मरीजों के लिए वरदान है, बल्कि उन लोगों के लिए भी उम्मीद की किरण है जो जन्मजात हृदय विकारों से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अगले एक वर्ष में मानव परीक्षण सफल रहते हैं, तो 2027 के अंत तक यह उपचार अस्पतालों में उपलब्ध हो सकता है। यह रीजेनरेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में अब तक की सबसे बड़ी छलांग मानी जा रही है।
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