चुनाव आयोग मनमानी नहीं कर सकता
राष्ट्रीय खबर
कोलकाताः कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई की, जिसमें पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद भारत निर्वाचन आयोग द्वारा वरिष्ठ नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के अभूतपूर्व तबादलों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि चुनाव आयोग की यह कार्रवाई न केवल प्रशासनिक ढांचे को प्रभावित कर रही है, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन है।
अदालत में दी गई दलीलों के अनुसार, 15 मार्च को दोपहर 3 बजे चुनाव की अधिसूचना जारी की गई थी, लेकिन इसके तुरंत बाद सुबह 3 बजे मुख्य सचिव और प्रधान सचिव का तबादला कर दिया गया, फिर डीजीपी को हटाया गया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेटों, पुलिस अधीक्षकों और पुलिस आयुक्तों के तबादलों की एक लंबी श्रृंखला शुरू हो गई।
अधिवक्ता बंदोपाध्याय ने चुनाव आयोग की कार्रवाई को विरोधाभासी बताते हुए सवाल उठाया कि यदि इन अधिकारियों को बंगाल में चुनावी प्रक्रिया से दूर रखा गया है, तो उन्हें दूसरे राज्यों में चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने के लिए कैसे भेजा जा सकता है? उन्होंने पूछा, वे यहाँ अयोग्य कैसे हो सकते हैं और वहाँ योग्य कैसे?
याचिका में तर्क दिया गया कि इस बड़े पैमाने पर किए गए फेरबदल ने राज्य के शासन को पंगु बना दिया है। वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया, आपने एसपी और डीएम को हटा दिया है, अब राज्य की देखभाल कौन करेगा? यदि कोई आपदा आती है, तो चुनाव आयोग क्या करेगा? उन्होंने जोर देकर कहा कि मुख्य सचिव का काम केवल चुनाव कराना नहीं है, बल्कि पूरे राज्य को चलाना है।
तबादलों के पैमाने पर चिंता जताते हुए उन्होंने बताया कि जहाँ 2021 के चुनावों में लगभग 15 अधिकारियों को हटाया गया था, वहीं अब यह संख्या 79 तक पहुँच गई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यही सिलसिला चला तो अंत तक सभी आईएएस और आईपीएस अधिकारी हटा दिए जाएंगे, जिससे एक प्रशासनिक शून्य पैदा हो जाएगा।
संवैधानिक शक्तियों के दायरे पर सवाल उठाते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि क्या चुनाव आयोग अनुच्छेद 324 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए मनमाने ढंग से कार्य कर सकता है? उन्होंने पूछा, क्या वे संघीय ढांचे को नष्ट कर सकते हैं?
आयोग की भूमिका की सीमाओं पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग चुनाव की निगरानी कर सकता है, लेकिन राज्य शासन नहीं चला सकता। यह भी तर्क दिया गया कि प्रशासन और कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अनुभवी अधिकारियों का अचानक तबादला अनुचित है, विशेषकर तब जब पिछले कई महीनों से आयोग ने उनकी कार्यप्रणाली पर कोई असंतोष व्यक्त नहीं किया था।