Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
अत्यधिक ताप सहने वाला नया चिप तैयार Bengal Election 2026: ममता बनर्जी को बड़ा झटका, इस सीट से TMC उम्मीदवार का नामांकन रद्द; जानें अब कि... Mathura Boat Accident Video: मौत से चंद लम्हे पहले 'राधे-राधे' का जाप कर रहे थे श्रद्धालु, सामने आया... पाकिस्तान: इस्लामाबाद में अघोषित कर्फ्यू! ईरान-यूएस पीस टॉक के चलते सुरक्षा सख्त, आम जनता के लिए बुन... Anant Ambani Guruvayur Visit: अनंत अंबानी ने गुरुवायुर मंदिर में किया करोड़ों का दान, हाथियों के लिए... पश्चिम बंगाल चुनाव: बीजेपी का बड़ा दांव! जेल से रिहा होते ही मैदान में उतरा दिग्गज नेता, समर्थकों ने... Nashik News: नासिक की आईटी कंपनी में महिलाओं से दरिंदगी, 'लेडी सिंघम' ने भेष बदलकर किया बड़े गिरोह क... EVM Probe: बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पहली बार दिया EVM जांच का आदेश; जानें मुंबई विधानसभा ... Rajnath Singh on Gen Z: 'आप लेटेस्ट और बेस्ट हैं', रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने Gen Z की तारीफ में पढ... SC on Caste Census: जाति जनगणना पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, याचिकाकर्ता को फटकार लगा CJI...

ट्रंप का युद्धोन्माद आखिर दुनिया क्यों झेले

ईरान और पश्चिमी शक्तियों के बीच चल रहा वर्तमान संघर्ष तकनीकी रूप से विश्व युद्ध की श्रेणी में नहीं आता, लेकिन इसके वैश्विक परिणाम किसी महायुद्ध से कम नहीं हैं। पूरी दुनिया इस युद्ध की भारी कीमत चुका रही है। कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें, वैश्विक व्यापार मार्गों में आई भारी रुकावटें और अंतरराष्ट्रीय यात्रा व परिवहन व्यवस्था का पूरी तरह चरमरा जाना—ये सब इस बात का प्रमाण हैं कि मध्य-पूर्व की आग आज हर घर की रसोई और अर्थव्यवस्था तक पहुँच चुकी है।

अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि यह युद्ध कब और कैसे समाप्त होगा? और उससे भी महत्वपूर्ण यह कि इसे रोकने की क्षमता और इच्छाशक्ति किसमें है? वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से इस युद्ध को रोकने की उम्मीद करना बेमानी लगता है। ऊपर से खाड़ी के सुन्नी प्रधान देश उन्हें लगातार उकसा रहे हैं। इन देशों का तर्क है कि ईरान की सैन्य शक्ति को इस हद तक पंगु बना दिया जाना चाहिए कि वह भविष्य में कभी भी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा न बन सके।

दूसरी ओर, ईरान द्वारा युद्धविराम की गुहार लगाने की संभावना भी क्षीण नजर आती है। ईरान इस पूरे संघर्ष को, जिसमें अमेरिका और इजराइल एक साथ हैं, अपने अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में देख रहा है। रणनीति के मोर्चे पर एक अजीबोगरीब तर्कहीनता भी देखने को मिल रही है। यह सर्वविदित है कि युद्ध में सब कुछ जायज है, लेकिन सामरिक दृष्टि से यह समझ से परे है कि ईरान ने इजराइल के मुकाबले खाड़ी के अरब देशों पर दस गुना अधिक मिसाइलें क्यों दागी हैं?

ईरान, जो एक शिया-बहुसंख्यक राष्ट्र है, उसे इस सुन्नी-बहुल क्षेत्र में स्थायी शत्रुता की कीमत चुकानी होगी। तेहरान का वर्तमान शासन, जो धार्मिक नेताओं के हाथ में है, वास्तव में ईरान रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स के नियंत्रण में अधिक दिखाई देता है। यह शासन अमेरिका पर सीधे प्रहार करने का जोखिम उठा रहा है, लेकिन इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। इतिहास गवाह है कि केवल हवाई हमलों के दम पर किसी देश में सत्ता परिवर्तन या क्रांति नहीं लाई जा सकती, विशेषकर ईरान जैसे देश में।

ईरान का इतिहास रहा है कि उसने पिछले पांच दशकों में विद्रोह, असहमति और आलोचना को कुचलने के लिए अपने ही लाखों नागरिकों की बलि चढ़ाने में संकोच नहीं किया है। ऐसे में बाहरी सैन्य दबाव वहां के कट्टरपंथी शासन को और अधिक क्रूर बना सकता है, जिससे आम जनता की मुश्किलें और बढ़ेंगी। इजराइल, जो वर्षों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियों को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता रहा है, अब पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा है।

इजराइल ने हमेशा अपनी खुफिया एजेंसी मोसाद के सटीक इनपुट और आधुनिक तकनीक के दम पर ईरानी नेतृत्व को निशाना बनाया है। वर्तमान में जारी मिसाइल और ड्रोन युद्ध इजराइल के लिए उस अंतिम युद्ध जैसा है जिसे वह निर्णायक मोड़ तक ले जाना चाहता है।

वहीं, खाड़ी देशों के लिए स्थिति इधर कुआं उधर खाई जैसी है। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि ईरान उनके साथ संबंधों की हर रेड लाइन को पार कर जाएगा। दशकों की मेहनत और खरबों डॉलर के निवेश से बनाई गई उनकी सुरक्षा और स्थिरता की छवि अब खंडित हो चुकी है। वे अब इस युद्ध से ऐसी घातक उम्मीदों के साथ बंध गए हैं जहाँ से सुरक्षित निकलना मुश्किल लग रहा है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी विडंबना रूस की भूमिका है। वह रूस, जिसने खुद यूक्रेन पर आक्रमण किया है, आज इस संघर्ष में एक मध्यस्थ या शांतिदूत बनने का ढोंग कर रहा है। वास्तव में, रूस के लिए ईरान का यह युद्ध एक आर्थिक वरदान साबित हो रहा है। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण रूस भारी मुनाफा कमा रहा है।

विडंबना यह भी है कि ऊर्जा बाजार की तपिश को कम करने के लिए खुद अमेरिका ने रूस पर लगे कई प्रतिबंधों में ढील दी है, ताकि आपूर्ति बनी रहे। अंततः, यह युद्ध केवल हथियारों का नहीं बल्कि अहंकार और वर्चस्व का संघर्ष बन गया है। जब तक विश्व की प्रमुख शक्तियां अपने स्वार्थों को त्यागकर एक साझा मंच पर नहीं आतीं, तब तक इस उन्मादी युद्ध का अंत दिखाई नहीं देता। क्या संयुक्त राष्ट्र या कोई अन्य वैश्विक संगठन इसमें दखल दे पाएगा, या फिर दुनिया को एक और बड़े आर्थिक और मानवीय संकट की ओर बढ़ते हुए मूकदर्शक बनकर देखना होगा? इस युद्ध को वही रोक सकता है जो यह समझ सके कि मध्य-पूर्व की राख में किसी की जीत नहीं, बल्कि पूरी मानवता की हार छिपी है।