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थाईलैंड के मछुआरों की बेरोजगार की समस्या

ईरान युद्ध से फैले ऊर्जा संकट का वैश्विक असर जारी

बैंकॉकः समुद्र की लहरों से अपनी आजीविका निकालने वाले थाईलैंड के मछुआरों के लिए आज समुद्र से ज्यादा जमीन पर चुनौतियां बढ़ गई हैं। मध्य पूर्व में छिड़े युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को इस कदर प्रभावित किया है कि डीजल की आसमान छूती कीमतों ने सैकड़ों मछुआरों को अपने जहाज बंदरगाहों पर खड़े करने के लिए मजबूर कर दिया है। 27 वर्षीय मछुआरे नरोंगसाक कोंगसुक उन्हीं में से एक हैं, जो अब समुद्र से दूर अपने घर की ओर लौटने को मजबूर हैं।

नरोंगसाक आमतौर पर महीने में लगभग 20,000 बाट (करीब 615 डॉलर) कमा लेते थे, लेकिन अब नावों के डॉक पर खड़े होने से उन्हें अपने परिवार के भविष्य की चिंता सता रही है। एक प्लास्टिक बैग में अपना सामान समेटे हुए उन्होंने बताया, बच्चे के दूध का खर्च है, गाड़ी की किस्तें हैं और कई अन्य घरेलू खर्च हैं। अब मुझे गुजारे के लिए पार्ट-टाइम नौकरियों की तलाश करनी होगी। यह स्थिति केवल एक मछुआरे की नहीं, बल्कि थाईलैंड के तटीय इलाकों में रहने वाले हजारों परिवारों की है।

पटाया के पास श्रीराचा जेट्टी पर अपनी नाव को खड़ा करने वाले 60 वर्षीय नाव मालिक क्वानचाई फातिसेना ने भारी मन से अपनी नाव को कम से कम दो सप्ताह के लिए खड़ा रखने का फैसला किया है। पिछले 50 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़े क्वानचाई कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया।

डीजल, जो उनके व्यवसाय का मुख्य खर्च है, अब इतना महंगा हो गया है कि समुद्र में जाकर मछली पकड़ना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। बंदरगाह पर अब सन्नाटा है, जहाँ केवल बगुले और आवारा बिल्लियाँ इधर-उधर गिरे हुए मछलियों के टुकड़ों के लिए संघर्ष करते दिखते हैं।

थाईलैंड में मछुआरों को ग्रीन ऑयल के नाम से टैक्स-फ्री डीजल की सुविधा मिलती है। 28 फरवरी को मध्य पूर्व में युद्ध शुरू होने से पहले, इस डीजल की कीमत 20 बाट प्रति लीटर से भी कम थी। लेकिन मौजूदा संकट के कारण यह अब 35 बाट तक पहुँच गई है और इसकी उपलब्धता भी काफी कम हो गई है। सब्सिडी वाले ईंधन की कमी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता ने थाईलैंड के मत्स्य पालन उद्योग को घुटनों पर ला दिया है।