वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कच्चे तेल का संकट
मध्य पूर्व के हृदय स्थल, ईरान में जारी भीषण सैन्य संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल दिया है, बल्कि पूरी दुनिया के सामने एक तैलजन्य महासंकट खड़ा कर दिया है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए आर्थिक विशेषज्ञों ने एक भयावह भविष्यवाणी की है कि यदि ईरान में युद्ध की ज्वाला शांत नहीं हुई, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक और विनाशकारी स्तर को छू सकती हैं।
यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि एक ऐसा आर्थिक संकेत है जो विश्व अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक समुदाय ने युद्ध रोकने के लिए तत्काल और प्रभावी सक्रियता नहीं दिखाई, तो मानवता एक ऐसी आर्थिक सुनामी का सामना करेगी जिससे उबरने में दशकों लग सकते हैं। युद्ध के आर्थिक प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संघर्ष शुरू होने से ठीक पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 69 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर थी।
उस समय दुनिया कोरोना महामारी के बाद धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही थी। लेकिन युद्ध शुरू होने के मात्र 12 दिनों के भीतर, कीमतों में अप्रत्याशित उछाल आया और यह आंकड़ा 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। कीमतों में हुई यह लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि यह दर्शाती है कि बाजार में कितनी घबराहट है। ऊर्जा विशेषज्ञों और ईरान मामलों के रणनीतिकारों का स्पष्ट कहना है कि यदि यह सैन्य अभियान लंबे समय तक खिंचता है, तो आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी, जिससे कीमतें 200 डॉलर के स्तर तक पहुंचना अपरिहार्य हो जाएगा।
इस संकट का सबसे संवेदनशील बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य है। यह संकरा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित है। दुनिया का लगभग 20 से 30 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है। ईरान के पास इस जलमार्ग को अवरुद्ध करने की क्षमता है। यदि युद्ध के कारण यह मार्ग बंद होता है, तो सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों का निर्यात ठप हो जाएगा। युद्धग्रस्त क्षेत्र होने के कारण समुद्री जहाजों का बीमा कई गुना महंगा हो गया है, जिससे उपभोक्ता देशों तक पहुँचने वाले तेल की लागत में स्वतः वृद्धि हो रही है।
जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन की कीमतें सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं। परिवहन लागत बढ़ने से सब्जी, फल और अनाज से लेकर कारखानों में बनने वाले हर सामान की कीमत बढ़ जाती है। इससे सामान्य जनजीवन की क्रय शक्ति कम हो जाती है। तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर वैश्विक मुद्रास्फीति को जन्म देता है।
अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों में महंगाई दर दहाई के अंक को छू सकती है। जब बुनियादी जरूरतें महंगी होती हैं, तो मध्यम और निम्न वर्ग की बचत खत्म होने लगती है, जो अंततः आर्थिक मंदी का कारण बनती है। प्लास्टिक, उर्वरक, दवाइयां और सिंथेटिक कपड़े—ये सभी उद्योग कच्चे तेल के उप-उत्पादों पर निर्भर हैं। कच्चे तेल का 200 डॉलर तक पहुँचना इन उद्योगों की उत्पादन लागत को इतना बढ़ा देगा कि वैश्विक बाजार में मांग न्यूनतम स्तर पर आ जाएगी, जिससे बड़े पैमाने पर छंटनी और बेरोजगारी की स्थिति पैदा होगी।
भारत जैसे देश, जो अपनी तेल जरूरतों का 80% से अधिक हिस्सा आयात करते हैं, उनके लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। तेल महंगा होने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से कम होगा और डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर जा सकता है। सरकार को बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं के बजट में कटौती कर तेल सब्सिडी या तेल बिल चुकाने में पैसा लगाना पड़ेगा, जिससे देश की जीडीपी विकास दर धीमी हो जाएगी।
ईरान में जलती यह आग केवल एक भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं है। यह एक वैश्विक आर्थिक वज्रपात है। यदि विश्व के शक्तिशाली देश केवल सैन्य रणनीतियों में उलझे रहे और कूटनीतिक समाधान नहीं तलाशा, तो तेल की यह बढ़ती कीमतें विश्व अर्थव्यवस्था के ढांचे को ताश के पत्तों की तरह बिखेर देंगी।
वर्तमान में जरूरत इस बात की है कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन केवल औपचारिक निंदा न करें, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए युद्धविराम की दिशा में ठोस कदम उठाएं। अन्यथा, यह युद्ध और तेल का दाम दुनिया को एक ऐसी अंधेरी गुफा में ले जाएगा जहाँ से बाहर निकलने का रास्ता किसी भी अर्थशास्त्री के पास नहीं होगा। अब भारत सहित दुनिया के अन्य देशों के नीति निर्धारकों को यह तय करना होगा कि वे अंकल सैम(अमेरिकी राष्ट्रपति) की सनक के आगे किस तरीके से अपना विरोध दर्ज करायेंगे।