नीतीश बाहर तो बिहार के का होई
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बिहार की राजनीति से बाहर होना न केवल राज्य के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि इसके भाजपा की राष्ट्रीय रणनीति और उसके भविष्य के सपनों पर भी उतने ही गहरे प्रभाव हैं, जितने पहली नज़र में दिखाई देते हैं। नीतीश कुमार को राज्य की सत्ता से हटाकर उच्च सदन (राज्यसभा) की ओर भेजने के इस रणनीतिक कदम के साथ ही, भाजपा ने अपने रास्ते से एक बहुत बड़ी क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत को साफ कर दिया है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि राज्यसभा सांसद बनना उनकी पुरानी इच्छा थी, लेकिन विपक्ष इसे भाजपा द्वारा रचित एक नेतृत्व तख्तापलट और राजनीतिक अपहरण करार दे रहा है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि भाजपा ने लगभग 5 महीने पहले हुए बिहार चुनावों में जनता द्वारा दिए गए जनादेश के साथ विश्वासघात किया है। नीतीश का कहना है कि वह नई सरकार का समर्थन करेंगे और विकसित बिहार बनाने के लिए मिलकर काम करने का उनका संकल्प अटल रहेगा।
देश में सरकार बनाने के लिए 272 सीटों की जादुई संख्या की आवश्यकता होती है। इस झटके ने भाजपा को हिंदी पट्टी में अपनी राजनीतिक रणनीति को फिर से कैलिब्रेट करने के लिए मजबूर किया है। पार्टी की दीर्घकालिक योजना यह है कि यदि संभव हो, तो परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाए ताकि लोकसभा सीटों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हो सके और आने वाले कई वर्षों तक देश के शासन पर उसका नियंत्रण स्थापित रहे।
वर्षों से बिहार उन कुछ बड़े हिंदी भाषी राज्यों में से एक रहा है जहाँ भाजपा शक्तिशाली तो थी, लेकिन शासन का प्राथमिक चेहरा नहीं थी। बिहार से नीतीश के हटने के साथ ही भाजपा को राज्य सरकार पर प्रभावी नियंत्रण मिल गया है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अक्सर पलटू राम के नाम से पुकारा जाता रहा है, क्योंकि वह अपनी राजनीतिक वफादारी बदलने और बार-बार गठबंधन तोड़ने या बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं।
इसलिए, बिहार की राजनीति से उनका हटना गठबंधन की अस्थिरता के जोखिम को कम करता है। वैचारिक और संगठनात्मक सुदृढ़ता के भाजपा के राष्ट्रीय सपने के लिए यह बदलाव वैकल्पिक क्षेत्रीय शक्ति केंद्रों को कमजोर करता है और दिल्ली-केंद्रित निर्णय लेने की प्रक्रिया को पुख्ता करता है। यह मजबूत केंद्रीय नेतृत्व के तहत भाजपा के संरचनात्मक विकास के अनुकूल है।
बिहार में अब इस बात की पूरी संभावना है कि शासन की पूरी जिम्मेदारी भाजपा के हाथों में होगी और वह सुशासन का पूरा श्रेय खुद ले सकेगी। यह बदलाव बिहार की जातिगत राजनीति के समीकरणों को भी बदल सकता है। भाजपा के पास अब नीतीश कुमार के बैनर के बजाय अपने स्वयं के बैनर तले ओबीसी और ईबीसी के बीच अपने समर्थन आधार को मजबूत करने का अधिक अवसर होगा। बिहार की राजनीति का भविष्य अब केवल अटकलों के दायरे में है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि नीतीश कुमार ने अति पिछड़ों के गठबंधन, महादलितों तक पहुँच और अल्पसंख्यकों के संतुलन को सफलतापूर्वक प्रबंधित किया है। यहीं भाजपा के लिए जोखिम भी छिपा है। यदि भाजपा इस सामाजिक समीकरण को संभालने में विफल रहती है, तो विपक्षी ताकतें इसका लाभ उठा सकती हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जदयू का जनाधार तेजी से घट सकता है और वह राज्य में अपनी एक ‘मध्यम-धर्मनिरपेक्ष सहयोगी’ वाली छवि खो सकती है।
लोग अब इस पार्टी को भाजपा नेतृत्व द्वारा नियंत्रित सहयोगी के रूप में देखेंगे। भाजपा ने पहले ही एक राष्ट्रीय संदेश दे दिया है कि वह कई राज्यों में एक कनिष्ठ भागीदार से बढ़कर गठबंधन की राजनीति में एक प्रभावी भागीदार के रूप में उभरी है। नीतीश का निकास इस बात की पुष्टि करता है कि क्षेत्रीय किंगमेकर का युग अब ढलान पर है। यह गठबंधन युग के संघीय संतुलन से केंद्रीकृत पार्टी वर्चस्व की ओर एक स्पष्ट संक्रमण है।
यह भाजपा की उस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के लिए एक संरचनात्मक लाभ है, जिसके तहत वह पूरे भारत, विशेषकर हिंदी पट्टी में एकमात्र प्रमुख शासी दल बनना चाहती है। नीतीश के जाने के साथ ही बिहार में राजनीति का एक दौर समाप्त हो गया है, जिससे राज्य में राजनीति के एक नए युग का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यह नया युग संभवतः भाजपा के वर्चस्व वाला होगा, लेकिन नीतीश कुमार जैसे कद्दावर क्षेत्रीय क्षत्रप की अनुपस्थिति में यह विपक्ष के लिए भी मैदान को अधिक खुला बना देगा। लेकिन बिहार ऐसा राज्य है, जिसके वोटरों की सोच का आकलन पार्टियां अक्सर नहीं कर पाती है। वोट तो नीतीश के नाम पर मिला था तो अब आगे जनता का मिजाज क्या होगा, इसे समझने की जरूरत है।