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ले जनरल पीपी सिंह को मिलेगी कमान

पश्चिमी सैन्य कमान को मिल सकता है नया कमांडर

राष्ट्रीय खबर

चंडीगढ़ः भारतीय सेना के शीर्ष नेतृत्व में एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल होने जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, सेना के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल पी.पी. सिंह इस वर्ष 1 अप्रैल से पश्चिमी सेना कमांडर के रूप में कार्यभार संभाल सकते हैं। वह लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार का स्थान लेंगे, जो 31 मार्च को अपनी विशिष्ट सेवाओं के बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

पश्चिमी कमान का सामरिक महत्व चंडीगढ़ के चंडीमंदिर में मुख्यालय वाली पश्चिमी कमान भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण परिचालन संरचनाओं में से एक मानी जाती है। यह कमान पाकिस्तान के साथ लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा के एक विशाल हिस्से की निगरानी करती है, जिसमें जम्मू क्षेत्र के जम्मू, सांबा और कठुआ जिले शामिल हैं।

इसके अलावा, पंजाब का पठानकोट क्षेत्र भी इसी के दायरे में आता है। हाल के दिनों में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उत्तरी कमान के साथ मिलकर इस फॉर्मेशन ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेफ्टिनेंट जनरल पी.पी. सिंह, जो विशिष्ट पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) से आते हैं, उन चुनिंदा विशेष बल अधिकारियों में शामिल होंगे जो सेना की किसी कमान का नेतृत्व करेंगे।

दक्षिणी और पूर्वी कमान में भी बदलाव नियुक्तियों का यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन, जो वर्तमान में दक्षिणी कमान में चीफ ऑफ स्टाफ हैं, को पदोन्नत कर पुणे स्थित दक्षिणी सेना कमांडर बनाए जाने की उम्मीद है। वह लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ की जगह लेंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ सेना मुख्यालय में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के रूप में नई जिम्मेदारी संभाल सकते हैं।

वहीं, सेना के क्वार्टरमास्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वी.एम.बी. कृष्णन को 10 अप्रैल से पूर्वी सेना कमांडर नियुक्त किए जाने की संभावना है। कोलकाता स्थित यह कमान चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ-साथ म्यांमार और बांग्लादेश की सीमाओं की रक्षा करती है। वह लेफ्टिनेंट जनरल राम चंदर तिवारी का स्थान लेंगे, जो इसी महीने सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर और अन्य नियुक्तियाँ सूत्रों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में तैनात कुछ जनरल ऑफिसर कमांडिंग को फिलहाल इस फेरबदल से बाहर रखा गया है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है, इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों में नेतृत्व की निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है। सेना के कमांडरों के बीच यह बड़ा फेरबदल आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल से प्रभावी होने की उम्मीद है।