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जिनेवा की अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता में नया गतिरोध

यूरेनियम संवर्धन में कटौती का प्रस्ताव खारिज

जिनेवा: स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आयोजित परमाणु वार्ता का तीसरा और महत्वपूर्ण दौर आज एक बार फिर गंभीर अनिश्चितता के साये में घिर गया है। पिछले छह घंटों से छनकर आ रही खबरों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में हलचल ने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए हैं कि ईरान और पश्चिमी देशों के बीच का गतिरोध टूटने के बजाय और अधिक जटिल होता जा रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ताओं ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए ईरान द्वारा प्रस्तुत यूरेनियम संवर्धन में कटौती के नवीनतम प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। वाशिंगटन ने इस प्रस्ताव को अपर्याप्त और अस्पष्ट करार देते हुए कहा है कि यह मौजूदा सुरक्षा चिंताओं का समाधान करने में विफल है।

ईरान का पक्ष यह है कि वह अपने यूरेनियम संवर्धन स्तर को 2015 के संयुक्त व्यापक कार्य योजना द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर लाने के लिए तैयार है। हालाँकि, तेहरान ने इसके बदले में एक कड़ी शर्त रखी है कि ईरान पर लगे सभी आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंधों को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए। ईरान के मुख्य वार्ताकार का तर्क है कि जब तक प्रतिबंधों का बोझ कम नहीं होता, तब तक तकनीकी रियायतें देना संभव नहीं है।

अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों (ई3—ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी) का तर्क ईरान के दावों से कहीं अधिक गहरा है। पश्चिमी देशों का मानना है कि 2015 से अब तक ईरान ने न केवल यूरेनियम का भंडार बढ़ाया है, बल्कि उन्नत सेंट्रीफ्यूज और परमाणु अनुसंधान में ऐसा तकनीकी ज्ञान हासिल कर लिया है, जिसे केवल संवर्धन की दर कम करके वापस नहीं लिया जा सकता।

वाशिंगटन अब एक ऐसे स्थायी सुरक्षा ढांचे की मांग कर रहा है, जो 2015 के समझौते की समय-सीमाओं से परे हो। अमेरिका चाहता है कि भविष्य में ईरान द्वारा परमाणु हथियार विकसित करने की किसी भी संभावना को तकनीकी और कानूनी रूप से पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। दूसरी ओर, ईरान बिना किसी समाप्ति तिथि वाली शर्तों को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानकर मानने से स्पष्ट इनकार कर रहा है।

वार्ता की मेज पर मौजूद राजनयिकों का कहना है कि यह कूटनीतिक प्रयास अब अपने सबसे नाजुक मोड़ पर है। यदि अगले 24 घंटों के भीतर किसी मध्य मार्ग या फ्रेमवर्क पर सहमति नहीं बनती, तो यह वार्ता विफल घोषित की जा सकती है। इस विफलता का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वार्ता टूटने की स्थिति में ईरान पर और भी कड़े प्रतिबंध लागू हो सकते हैं, जिससे वैश्विक तेल बाजारों में अस्थिरता और कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका ने निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय समुदायों की चिंता बढ़ा दी है।