योगी आदित्यनाथ से सीधी टक्कर के बीच बदलते समीकरण
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः वाराणसी स्थित श्री विद्या मठ में हाल ही में हुई एक गुप्त मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक और धार्मिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। सीबीआई के पूर्व अंतरिम निदेशक एम. नागेश्वर राव ने मंगलवार को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से एकांत में लगभग 25 मिनट तक चर्चा की। यद्यपि इसे पहली नजर में एक शिष्टाचार भेंट या गुरु-शिष्य परंपरा का हिस्सा माना गया था, लेकिन इस मुलाकात की टाइमिंग और इसके पीछे के उद्देश्य कहीं अधिक गंभीर हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद एम. नागेश्वर राव ने प्रशासनिक सक्रियता को नहीं छोड़ा है। वे वर्तमान में कुछ पूर्व वरिष्ठ नौकरशाहों और अनुभवी पत्रकारों के साथ मिलकर एक नागरिक समाज संगठन का हिस्सा हैं। यह टीम प्रयागराज के माघ मेले के दौरान हुई विवादास्पद घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करने में जुटी है।
इस जांच का मुख्य केंद्र बिंदु वह घटनाक्रम है जो 18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के दिन घटित हुआ था। जांच दल यह समझने की पुरजोर कोशिश कर रहा है कि आखिर उस दिन परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल कैसे हुईं कि शंकराचार्य की पारंपरिक पालकी यात्रा को रोकना पड़ा।
जांच के दायरे में जिला प्रशासन द्वारा यात्रा को रोकने के लिए लिए गए निर्णयों का कानूनी और प्रक्रियात्मक आधार, पालकी यात्रा के लिए कोई औपचारिक नोटिस जारी किया था? यदि हाँ, तो उसके पीछे के ठोस कारण क्या थे? वह कौन सा क्षण था जब परंपरा और कानून के बीच का सामंजस्य बिगड़ा और स्थिति तनावपूर्ण हो गई? सूत्रों के मुताबिक, पूर्व सीबीआई चीफ की अगुवाई में यह टीम न केवल मौके पर मौजूद रहे पुलिस अधिकारियों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज कर रही है, बल्कि प्रशासन से उन आधिकारिक दस्तावेजों को भी साझा करने की मांग कर रही है, जो इस पूरे मामले से जुड़े हैं।
यह जांच केवल प्रशासनिक दांव-पेच तक सीमित नहीं है। टीम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर हाल ही में दर्ज हुई एफआईआर और उन पर लगे यौन शोषण जैसे गंभीर आरोपों की भी परतें खोलने का प्रयास कर रही है। एम. नागेश्वर राव जैसे अनुभवी व्यक्ति का इस मामले में शामिल होना यह संकेत देता है कि इस रिपोर्ट को साक्ष्य-आधारित और अत्यंत गंभीर बनाया जा रहा है।
इस जांच रिपोर्ट को भविष्य में सार्वजनिक किए जाने की तैयारी है, जिसका उद्देश्य आम जनता को माघ मेला विवाद के पीछे की असली सच्चाई से अवगत कराना है। यह घटनाक्रम न केवल न्याय की दिशा में एक कदम माना जा रहा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा अब स्वतंत्र नागरिक समाज द्वारा किस स्तर पर की जा रही है।