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सुरों की महफिल: बैजू बावरा महोत्सव में गूंजा ध्रुपद संगीत, ऋत्विक सान्याल की जादुई प्रस्तुति ने मोह लिया सबका मन

ग्वालियर: राजा मानसिंह तोमर म्यूजिक एंड आर्ट यूनिवर्सिटी में चल रहे 3 दिवसीय बैजू बावरा महोत्सव का शुक्रवार को समापन हो गया. इस अवसर पर विषय विशेषज्ञ के रूप में वाराणसी से आए पद्मश्री पं ऋत्विक सान्याल ने गायन में ध्रुपद के महत्व और बैजू बावरा पर व्याख्यान दिया. साथ ही उन्होंने सांगीतिक प्रस्तुति भी दी. कार्यक्रम के समापन के दौरान ग्वालियर के पूर्व सांसद विवेक नारायण शेजवलकर सहित गणमान्य लोग मौजूद रहे.

पद्मश्री पं सान्याल ने समझाया ध्रुपद का महत्व

व्याख्यान के दौरान श्रोताओं के साथ संगीत से जुड़े छात्रों से पद्मश्री पंडित ऋत्विक सान्याल ने कहा, “गायन में ध्रुपद का विशेष स्थान है और इसके प्रवर्तक के रूप में बैजू बावरा का नाम सर्व विदित है. बैजू अपने पदों के माध्यम से आज भी हमारे दिल में जीवंत हैं. संगीत में स्वर, लय, राग ताल का वर्णन करना सीखें. स्वर से स्वर दर्शन की ओर बढ़ने की कोशिश करें. संगीत या गायन में यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि राग ध्यान है, राग दृष्टि है और राग ही सृष्टि है. हमने संगीत का अधिकतर हिस्सा मंच से सीखा है.”

पद्मश्री ऋत्विक सान्याल ने सिखाए संगीत के गुर

इस दौरान पद्मश्री पंडित ऋत्विक सान्याल ने छात्र छात्राओं को राग तोड़ी में बंदिश भी सिखाई. उनके साथ पखावज पर आदित्य दीप ने सधी हुई संगति की. वहीं सांगीतिक प्रस्तुतियों के क्रम में शहर के युवा कलाकार आदित्य शर्मा ने राग भीम पलासी में ध्रुपद की मनमोहक प्रस्तुति दी. उनके साथ पखावज पर जयवंत गायकवाड़, तानपुरे पर देवेश और वैष्णवी ने संगति की.

राग शुद्ध सारंग में धमार की शानदार पेशकश

इन सांगेतिक प्रस्तुतियों में पद्मश्री ऋत्विक सान्याल को भी सुनने का मौका लोगों को मिला. उन्होंने राग शुद्ध सारंग से आलापचारी का शुभारंभ किया. उसके बाद धमार की आकर्षक बंदिश पेश की. राग शुद्ध सारंग में उन्होंने अपने बनाए पद प्रस्तुत किए. इस दौरान उनके साथ पखावज पर वाराणसी से आए आदित्य दीप ने, और तानपुरे में डॉ. पारुल दीक्षित व देवेंद्र सिंह ने संगति की.

‘लोगों ने जतायी हर साल आयोजन की इच्छा’

इस पूरे आयोजन को लेकर राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे ने कहा, “यह एक सफल आयोजन रहा है. इसमें जिस तरह के वरिष्ठजनों की सहभागिता रही और उन्होंने जिस तरह से अपनी बातें यहां कही हैं, जो चीजें हमारे बच्चों को जो सामने बैठे थे, उनको सिखाई हैं और बच्चों ने भी उतनी ही गंभीरता से उसको आत्मसात किया है. इस दृष्टि से यह एक सफल आयोजन माना जा सकता है. जितने भी वरिष्ठजन आए, उन्होंने जो अपना व्यक्तिगत अनुभव रहा उसके आधार पर आगे भी इस कार्यक्रम को प्रतिवर्ष आयोजित किए जाने की इच्छा जाहिर की है.”

आयोजन के दौरान श्रोताओं की कमी पर कुलगुरु सहस्त्रबुद्धे का कहना था, “आयोजन का आमंत्रण लगभग सभी को दिया गया था. सभी जगह शासकीय रूप में भी और व्यक्तिगत रूप में भी, लेकिन ये विधा और ये शैलियां ऐसी नहीं है कि एकदम भीड़ आकर उसको सुन ले, सीख ले या समझ ले. सिर्फ टेक्निकल व्यक्ति या लोग ही इसमें आनंद भी ले पाते हैं और उसको समझ भी पाते हैं.”