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एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग.. .. .. ..

राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है, लेकिन अक्सर यह बदलते स्टैंड और सुविधा के सिद्धांतों का मंच बन जाती है। जब नेता विपक्ष में होते हैं, तो जनता की आवाज़ बनकर व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही वही पुरानी व्यवस्था उनके लिए अपरिहार्य हो जाती है। यह विरोधाभास भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है।

जब हम वर्तमान सत्ता पक्ष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीते डेढ़ दशक के राजनीतिक सफर का आकलन करते हैं, तो एक पुराना फिल्मी गीत इस पूरी स्थिति पर सटीक बैठता है। इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानवी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। इसे लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग

याद रहता है किसे गुज़रे ज़माने का चलन

याद रहता है किसे…

सर्द पड़ जाती है चाहत हार जाती है लगन

अब मोहब्बत भी है क्या, इक तिजारत के सिवा

हम ही नादाँ थे जो ओढ़ा बीती यादों का कफ़न

वरना जीने के लिए सब कुछ भुला देते हैं लोग

वरना जीने के लिए सब कुछ भुला देते हैं लोग

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग

जाने वो क्या लोग थे जिनको वफ़ा का पास था

जाने वो क्या लोग थे…

दूसरे के दिल पे क्या गुज़रेगी ये अहसास था

अब हैं पत्थर के सनम जिनको अहसास न हो

वो ज़माना अब कहाँ जो अहल-ए-दिल को रास था

अब तो मतलब के लिए नाम-ए-वफ़ा लेते हैं लोग

अब तो मतलब के लिए नाम-ए-वफ़ा लेते हैं लोग

जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग।

वर्ष 2011 से 2014 के बीच का दौर भारतीय राजनीति का एक टर्निंग पॉइंट था। रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के नेतृत्व में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन चल रहा था। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस आंदोलन के सबसे बड़े नैतिक समर्थकों में से एक थे।

तत्कालीन कांग्रेस सरकार को घेरने के लिए नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं तक भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर तीखे प्रहार किए थे। उन्होंने कांग्रेस सरकार को कमजोर और भ्रष्ट बताते हुए कहा था कि एक मजबूत और स्वतंत्र लोकपाल ही देश को भ्रष्टाचार मुक्त बना सकता है। सीबीआइ के दुरुपयोग पर उन्होंने तत्कालीन केंद्र सरकार को पिंजरे का तोता तक करार दिया था और संघीय ढांचे पर चोट करने का आरोप लगाया था। उस समय भाजपा का स्टैंड पूरी तरह से एक सशक्त लोकपाल संस्था और जांच एजेंसियों की पूर्ण स्वायत्तता के पक्ष में था।

2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। लेकिन इसके बाद, अन्ना आंदोलन के दौरान किए गए वादे और दावों का रंग धीरे-धीरे बदलने लगा। जिस लोकपाल को लाने के लिए देश की सड़कों पर आंदोलन हुआ था, उसे लागू करने में केंद्र सरकार को पांच साल से अधिक का समय लग गया और जब लोकपाल की नियुक्ति हुई भी, तो वह वैसी शक्तिशाली और सक्रिय संस्था नहीं दिख सकी जिसकी परिकल्पना आंदोलन के समय की गई थी। इतना ही नहीं, विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस सीबीआई और ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की स्वायत्तता की वकालत करती थी, आज उन्हीं एजेंसियों की भूमिका पर विपक्षी दल तीखे सवाल उठा रहे हैं। आज की स्थिति यह है कि विपक्ष के जिन नेताओं पर कल तक भाजपा भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाती थी, वे जैसे ही भाजपा में शामिल होते हैं, उनके खिलाफ चल रहे मामले या तो ठंडे बस्ते में चले जाते हैं या वे क्लीन चिट पा जाते हैं।

साहिर लुधियानवी की लिखी लाइनें अब तो मतलब के लिए नाम-ए-वफ़ा लेते हैं लोग आज की राजनीतिक शुचिता पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। जो दल विपक्ष में रहते हुए आंदोलनों के कंधों पर चढ़कर जनता का विश्वास जीतते हैं, वे सत्ता में आते ही उन्हीं सिद्धांतों को भूल जाते हैं। अन्ना आंदोलन के समय भ्रष्टाचार के खिलाफ दिखाई गई जो प्रतिबद्धता एक चेहरा थी, वह सत्ता में आने के बाद राजनीतिक समीकरणों और दल-बदल को संरक्षण देने वाले दूसरे चेहरे में बदल गई है। यही कारण है कि जनता आज नेताओं के भाषणों और उनके पुराने स्टैंड को देखकर असमंजस में है कि उनका असली चेहरा कौन सा है।