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स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व सैनिकों ने अदालत में चुनौती दी

जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति म्नांगाग्वा के कार्यसाल के विस्तार का विरोध

हरारेः जिम्बाब्वे में राजनीतिक हलचल उस समय तेज हो गई जब देश के स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व सैनिकों ने राष्ट्रपति एमरसन म्नांगाग्वा के कार्यकाल विस्तार के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। दशकों तक सत्ता के स्तंभ रहे इन दिग्गजों का यह विद्रोह म्नांगाग्वा सरकार के लिए एक बड़ी कानूनी और राजनीतिक चुनौती बन गया है।

83 वर्षीय राष्ट्रपति एमरसन म्नांगाग्वा का वर्तमान कार्यकाल 2028 में समाप्त होने वाला है। जिम्बाब्वे के संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति केवल पांच-पांच साल के दो कार्यकाल तक ही राष्ट्रपति रह सकता है। हालांकि, प्रस्तावित संवैधानिक संशोधनों के तहत राष्ट्रपति के कार्यकाल को पांच से बढ़ाकर सात साल करने की योजना है। यदि यह बिल पास हो जाता है, तो म्नांगाग्वा 2030 तक सत्ता में बने रह सकेंगे।

छह पूर्व सैनिकों द्वारा दायर इस याचिका में मुख्य रूप से दो बिंदुओं को असंवैधानिक बताया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह बिल केवल वर्तमान राष्ट्रपति के कार्यकाल को अवैध रूप से बढ़ाने के उद्देश्य से बनाया गया है। नए प्रस्ताव के तहत राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता के बजाय संसद द्वारा किया जाना है। पूर्व सैनिकों का तर्क है कि ऐसे बड़े बदलावों के लिए जनमत संग्रह अनिवार्य है, जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है।

म्नांगाग्वा 2017 में रॉबर्ट मुगाबे के तख्तापलट के बाद सत्ता में आए थे। मुगाबे के 37 वर्षों के शासन में इन्हीं पूर्व सैनिकों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। अब, सत्ताधारी पार्टी झानू पीएफ के भीतर उत्तराधिकार को लेकर खींचतान जारी है। चूंकि संसद के दोनों सदनों में इस दल  का बहुमत है, इसलिए सरकार जनमत संग्रह के बजाय संसदीय वोट के जरिए इसे पारित करना चाहती है।

सरकारी प्रवक्ता निक मांगवाना ने इस चुनौती को कमतर बताते हुए कहा कि यह हजारों पूर्व सैनिकों में से केवल छह व्यक्तियों की निजी राय है। दूसरी ओर, पूर्व सैनिकों के वकील लवमोर माधुकु का कहना है कि यदि अदालत सहमत होती है, तो यह बिल शून्य घोषित हो जाएगा। यह अदालती मामला जिम्बाब्वे के लोकतंत्र के लिए निर्णायक साबित हो सकता है, क्योंकि यह तय करेगा कि क्या संविधान की बुनियादी संरचना को जनमत संग्रह के बिना बदला जा सकता है।