Breaking News in Hindi

गर्म आलू से बचाव का कुप्रचार

भारतीय राजनीति के रंगमंच पर हाल के घटनाक्रमों ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है: क्या देश का शासन ठोस निर्णयों के बजाय केवल नैरेटिव (विमर्श) को नियंत्रित करने के सहारे चल रहा है? लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विपक्ष से सुरक्षा खतरे का हवाला देकर सदन में न आने की सलाह देना और उसी दौरान पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरणों का चर्चा में आना, किसी संयोग से कहीं अधिक गहरा प्रतीत होता है।

संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी ने जनरल नरवणे की किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के उन अंशों को उद्धृत किया, जो अभी आधिकारिक रूप से बाजार में नहीं आई है। जैसे ही प्रधानमंत्री की निर्णय क्षमता पर सवाल उठे, अचानक लोकसभा अध्यक्ष का यह बयान आया कि प्रधानमंत्री को सदन के भीतर विपक्ष से शारीरिक खतरा है।

यह नैरेटिव को मोड़ने का एक स्पष्ट प्रयास था। सत्ता पक्ष ने तुरंत इस मुद्दे को विपक्ष के उग्र व्यवहार की ओर मोड़ दिया, ताकि प्रधानमंत्री की उस छवि को बचाया जा सके जिसे जनरल नरवणे के खुलासों ने चोट पहुंचाई थी। प्रश्न यह है कि यदि सुरक्षा का खतरा इतना वास्तविक था, तो खुफिया एजेंसियों—चाहे वह आईबी हो, एसपीजी हो या दिल्ली पुलिस—ने गृह मंत्रालय या पीएमओ को सूचित क्यों नहीं किया?

क्या संसदीय सुरक्षा सेवा अब विपक्षी सांसदों की जासूसी कर रही है? यदि खतरा वास्तविक था, तो अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष को विश्वास में क्यों नहीं लिया? ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री को सदन में राहुल गांधी के उन सवालों का सामना करने से बचाने के लिए यह सुरक्षा कवच तैयार किया गया, जिनका जवाब देना सरकार के लिए असहज था।

जनरल नरवणे का संस्मरण प्रधानमंत्री मोदी की उस छवि को सीधे तौर पर चुनौती देता है, जिसमें उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के परम रक्षक के रूप में पेश किया जाता है। कारवां पत्रिका में प्रकाशित अंशों के अनुसार, पूर्वी लद्दाख में चीनी घुसपैठ के समय सेना स्पष्ट निर्देशों के लिए दर-दर भटक रही थी। जनरल नरवणे ने लिखा है कि बार-बार मार्गदर्शन मांगने पर भी सरकार की ओर से केवल अस्पष्ट प्रतिक्रिया मिली: जो उचित समझो, वह करो।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी प्रधानमंत्री जॉर्जेस क्लेमेंस्यू ने कहा था कि युद्ध इतना महत्वपूर्ण मामला है कि इसे केवल जनरलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन नरवणे के खुलासे बताते हैं कि संकट की उस घड़ी में राजनीतिक नेतृत्व ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया था। प्रधानमंत्री ने कभी सीधे सेना प्रमुख से बात नहीं की; संदेश राजनाथ सिंह के जरिए भेजे गए।

यह डेलिगेशन (अधिकार सौंपना) नहीं, बल्कि इनडिसीजन (अनिर्णय) का मामला था। आज सरकार इस किताब के अप्रकाशित होने की तकनीकी आड़ लेकर संसद में चर्चा से भाग रही है, जबकि इसकी पीडीएफ फाइलें सोशल मीडिया पर हर जगह उपलब्ध हैं। नैरेटिव कंट्रोल करने की यह छटपटाहट भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में भी दिखाई देती है।

जिस दिन संसद में नरवणे के संस्मरणों पर बहस तेज हुई, उसी रात अचानक अमेरिका के साथ एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते की घोषणा कर दी गई। वास्तविकता यह है कि यह समझौता मार्च के मध्य से पहले हस्ताक्षरित होने की संभावना नहीं है। फिर भी, राष्ट्रपति ट्रंप को सोशल मीडिया पर आधी-अधूरी सच्चाइयों के साथ इसका जश्न मनाने दिया गया और प्रधानमंत्री ने भी तुरंत इसकी पुष्टि कर दी।

शायद प्रधानमंत्री को डर था कि ट्रंप, जो अपने सहयोगियों की कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए जाने जाते हैं, नरवणे के खुलासों के बाद भारत की इस कमजोरी का लाभ न उठाएं। एक ऐसा व्यापार समझौता करना जिसमें भारत ने अपना व्यापार अधिशेष गंवाने और 500 बिलियन डॉलर की खरीद का वादा किया है, किसी मास्टरस्ट्रोक के बजाय रक्षात्मक कदम अधिक प्रतीत होता है।

नरवणे के खुलासों ने केवल घरेलू राजनीति ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की स्थिति को प्रभावित किया है। लद्दाख संकट के दौरान भारत को अमेरिका से कूटनीतिक और खुफिया सहायता मिली थी। सेना प्रमुख का निर्देशों के लिए दर-दर भटकना एक खराब रणनीतिक संकेत है। यह दिखाता है कि जब दबाव चरम पर था, तब शीर्ष नेतृत्व उस ऊंचाई तक नहीं उठ सका जिसकी अपेक्षा की गई थी। विपक्ष से सुरक्षा खतरा और आधी-अधूरी ट्रेड डील—ये दोनों ही नैरेटिव को अपने पक्ष में करने की हताश कोशिशें हैं।

यह सरकार असहज सच्चाइयों का सामना करने के बजाय विषय बदलने में माहिर है। लेकिन केवल नैरेटिव बदल देने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती। स्टेट्समैनशिप (राजनेयिकता) के लिए निर्णायक नेतृत्व की आवश्यकता होती है, केवल सुर्खियों के प्रबंधन की नहीं। जनरल नरवणे के खुलासों ने उस छवि की नाजुकता को उजागर कर दिया है जिसे वर्षों की मेहनत और पीआर से गढ़ा गया था।