रूस और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रस्साकशी
मॉस्कोः फरवरी 2026 में यूक्रेन-रूस युद्ध अपने चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है, और इसी बीच वॉशिंगटन से आई जून डेडलाइन की खबर ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। ट्रंप प्रशासन ने इस युद्ध को समाप्त करने के लिए एक महत्वाकांक्षी खाका पेश किया है, जिसे आगामी जून तक लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। व्हाइट हाउस का मानना है कि यह समय सीमा न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है, बल्कि अमेरिका के आगामी मिडटर्म इलेक्शन (मध्यावधि चुनाव) के मद्देनजर भी महत्वपूर्ण है।
रूस ने इस शांति पहल पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कड़ा रुख अपनाया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने स्पष्ट किया है कि रूस वार्ता की मेज पर बैठने को तैयार है, लेकिन उसकी शर्तें अडिग हैं। मॉस्को की मुख्य मांग है कि यूक्रेन और पश्चिमी देश डोनबास (डोनेट्स्क और लुहान्स्क) और क्रीमिया की मौजूदा भौगोलिक वास्तविकता को आधिकारिक मान्यता दें। रूस इसे अपनी सुरक्षा और संप्रभुता का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका द्वारा प्रस्तावित बफर जोन और नाटो सुरक्षा गारंटी जैसे विकल्पों पर वह अब भी संशय में है।
दूसरी ओर, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी एक इंच जमीन भी रूस के कब्जे में छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने कूटनीतिक रास्ते खुले रखते हुए मियामी में होने वाली आगामी त्रिपक्षीय वार्ता में भाग लेने की पुष्टि की है। जेलेंस्की ने संकेत दिया है कि रूस द्वारा हाल ही में यूक्रेन के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर किए गए भीषण हमलों ने देश में बिजली और हीटिंग का गंभीर संकट पैदा कर दिया है, जिससे युद्ध विराम की आवश्यकता बढ़ गई है।
अमेरिकी प्रस्ताव के केंद्र में तीन प्रमुख बातें हैं। सीमा पर एक ऐसा क्षेत्र बनाना जहाँ किसी भी पक्ष की सेना न हो। यूक्रेन को भविष्य में रूसी आक्रमण से बचाने के लिए नाटो के समकक्ष सुरक्षा प्रदान करना, बशर्ते वह तुरंत नाटो सदस्यता की जिद छोड़ दे। रूस द्वारा पेश किया गया 12 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक प्रस्ताव (जिसे दमित्रीव पैकेज कहा जा रहा है), जो पुनर्निर्माण और भविष्य के व्यापार पर केंद्रित है।
पश्चिमी देशों में यूक्रेन को भारी सैन्य सहायता जारी रखने को लेकर बढ़ती हिचकिचाहट और वैश्विक ऊर्जा संकट ने इस शांति समझौते की राह प्रशस्त की है। यदि जून की समय सीमा तक कोई ठोस परिणाम निकलता है, तो यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। हालांकि, डोनबास और क्षेत्रीय अखंडता जैसे जटिल मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य बिठाना अभी भी एक हिमालयी चुनौती बना हुआ है।