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थाईलैंड चुनाव में नई लहर या पुरानी व्यवस्था का दबदबा?

पांच सौ सदस्यों वाले संसद के लिए चुनाव कार्यक्रम जारी

बैंकॉकः थाईलैंड में रविवार को 500 संसदीय सीटों के लिए हुआ मतदान न केवल देश के राजनीतिक भविष्य को तय करने वाला है, बल्कि यह 2017 के सैन्य-समर्थित संविधान को बदलने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है। चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस बार 75 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया है, जो पिछली बार की तुलना में करीब 5 फीसद अधिक है। यह उच्च मतदान प्रतिशत स्पष्ट रूप से थाई जनता, विशेषकर युवाओं के बीच राजनीतिक बदलाव की तीव्र आकांक्षा को दर्शाता है।

मतगणना के शुरुआती और अनौपचारिक रुझानों (92 प्रतिशत वोटों की गिनती तक) ने सबको चौंका दिया है। प्रधानमंत्री अनुतिन चर्नविराकुल के नेतृत्व वाली भूमिजयथाई पार्टी 194 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरती दिख रही है। वहीं, पूर्ववर्ती मूव फॉरवर्ड पार्टी के उत्तराधिकारी के रूप में उभरी पीपल्स पार्टी 116 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है। फेउ थाई पार्टी को फिलहाल 76 सीटें मिलने का अनुमान है।

इस चुनाव का सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण मुद्दा राजशाही के अपमान के खिलाफ कठोर कानून रहा है। पीपल्स पार्टी ने इस कानून में सुधार और सेना के राजनीति में हस्तक्षेप को पूरी तरह समाप्त करने के वादे पर चुनाव लड़ा है। मतदान के साथ-साथ एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह भी आयोजित किया गया है, जिसमें जनता से पूछा गया है कि क्या वे 2017 के जुंटा-शासित संविधान को बदलकर एक नया लोकतांत्रिक संविधान चाहते हैं।

भले ही लोकतंत्र समर्थक गठबंधन निचले सदन में मजबूत स्थिति में नजर आ रहा हो, लेकिन प्रधानमंत्री चुनने की प्रक्रिया अभी भी जटिल है। 2017 के संविधान के अनुसार, प्रधानमंत्री बनने के लिए संसद में 251 वोटों की आवश्यकता है। हालांकि अब सीनेट (ऊपरी सदन) के पास प्रधानमंत्री चुनने का सीधा वीटो अधिकार नहीं रहा है, लेकिन संवैधानिक संशोधनों और महत्वपूर्ण नियुक्तियों को रोकने के लिए उनके पास अभी भी पर्याप्त विधायी शक्तियाँ मौजूद हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते, थाईलैंड की राजनीतिक स्थिरता का असर वैश्विक बाजारों और पर्यटन उद्योग पर पड़ना तय है। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या विजेता दल एक स्थिर गठबंधन बनाने में सफल होगा या थाईलैंड एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध की ओर बढ़ेगा। अगले कुछ घंटों में आने वाले आधिकारिक परिणाम यह स्पष्ट कर देंगे कि मुस्कुराहटों की भूमि कहे जाने वाले इस देश में अब पूर्ण लोकतंत्र का सूरज उगेगा या पुरानी व्यवस्था का दबदबा कायम रहेगा।