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नेतन्याहू-ट्रंप शिखर सम्मेलन बुधवार को

अब्राहम समझौते के दूसरे चरण के विस्तार पर होगी चर्चा

वाशिंगटनः वॉशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस का ओवल ऑफिस आगामी बुधवार को एक ऐसी कूटनीतिक हलचल का गवाह बनने जा रहा है, जिसका असर आने वाले दशकों तक वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच होने वाली यह बैठक पहले फ्लोरिडा के मार-ए-लागो में प्रस्तावित थी, लेकिन व्हाइट हाउस के आधिकारिक बयान ने स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता के केंद्र वॉशिंगटन में यह मुलाकात दोनों देशों के बीच संबंधों की गंभीरता को दर्शाती है।

इस ऐतिहासिक वार्ता का सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा अब्राहम समझौते के दूसरे चरण का विस्तार करना है। ट्रंप के पिछले कार्यकाल में शुरू हुई इस पहल ने इजरायल और कई अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाया था। अब लक्ष्य सऊदी अरब जैसे प्रभावशाली देश को इस ढांचे में शामिल करना है। यदि रियाद इस समझौते का हिस्सा बनता है, तो यह मध्य-पूर्व के क्षेत्रीय एकीकरण और सुरक्षा वास्तुकला में एक क्रांतिकारी बदलाव होगा।

रणनीतिक स्तर पर, ट्रंप प्रशासन अपनी पुरानी मैक्सिमम प्रेशर की नीति को फिर से सक्रिय करने की तैयारी में है। इस बैठक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से ठप करने के लिए नए और कड़े प्रतिबंधों का खाका तैयार किया जाएगा। नेतन्याहू के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है; उन्हें गाजा और लेबनान सीमा (हिजबुल्लाह) पर चल रही सैन्य कार्रवाइयों के लिए न केवल अमेरिकी हथियारों, बल्कि बिना शर्त राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन की भी आवश्यकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक फिलिस्तीन मुद्दे पर पारंपरिक टू-स्टेट सॉल्यूशन की चर्चा को दरकिनार कर सकती है। इसके बजाय, ट्रंप के पुराने पीस टू प्रोस्पेरिटी मॉडल पर फिर से विचार किया जा सकता है, जो राजनीतिक संप्रभुता के बजाय आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग पर अधिक केंद्रित है।

यह मुलाकात नेतन्याहू के लिए ऐसे समय में एक लाइफलाइन की तरह है, जब वे इजरायल के भीतर तीव्र घरेलू राजनीतिक विरोध और कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इस बैठक के माध्यम से अमेरिका विश्व को यह स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि मध्य-पूर्व में वह अपने सबसे करीबी सहयोगी इजरायल के साथ चट्टान की तरह खड़ा है। यह गठबंधन न केवल ईरान विरोधी मोर्चे को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों और व्यापार मार्गों की स्थिरता को भी प्रभावित करेगा।