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कि मेरा प्रेम पत्र पढ़कर.. .. .. .. ..

भारतीय राजनीति और संसद के गलियारों में इन दिनों एक अजीबोगरीब साहित्यिक घमासान मचा हुआ है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक को लेकर देखने को मिल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को पत्र नहीं लिख रहा, बल्कि एक पूर्व जनरल के संस्मरणों के पन्ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच युद्ध पत्र बन गए हैं।

लोकसभा और राज्यसभा में स्थिति यह है कि विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी, जनरल नरवणे की किताब के उन अंशों को सार्वजनिक रूप से उद्धृत करने पर अड़े हैं, जिनमें 2020 के भारत-चीन संघर्ष (गलवान घाटी) का उल्लेख है। जिस तरह गीत के बोल कहते हैं—”तुम्हें मैं फूल कहता था, मगर फूलों में खार है”, उसी तर्ज पर विपक्ष सरकार पर आरोप लगा रहा है कि सीमा सुरक्षा के दावों के पीछे विफलता के कांटे छिपे हैं। राहुल गांधी का तर्क है कि प्रधानमंत्री ने जिम्मेदारी की पुष्पमाला पहनने के बजाय सारा बोझ सेना प्रमुख पर डाल दिया। सरकार इस पर वैसी ही नाराज़गी जता रही है जैसी गीत की नायिका से अपेक्षित थी, और इसी के चलते सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है।

संसद के बाहर प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य विपक्षी सांसदों द्वारा थामे गए ट्रैप डील के बैनर एक कड़वे प्रेम पत्र की तरह हैं, जो अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों पर सवाल उठा रहे हैं। गीत की पंक्ति—कि तुम मेरी दुआ हो, कि तुम मेरी वफ़ा हो—आज के संदर्भ में बदल गई है। विपक्ष पूछ रहा है कि क्या यह वफ़ा भारतीय हितों के प्रति है या किसी विदेशी शक्ति के दबाव के प्रति? सांसदों का निलंबन और प्रधानमंत्री की चुप्पी ने इस राजनीतिक संगम को और अधिक पेचीदा बना दिया है।

इसी बात पर वर्ष 1964 में बनी फिल्म संगम का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इस गीत को मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था। इस फिल्म के अभिनेता राज कपूर, वैजयंतीमाला और राजेंद्र कुमार थे। यह गीत फिल्म में राज कपूर पर फिल्माया गया है।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

मुखड़ा: मेरा प्रेम पत्र पढ़कर, कि तुम नाराज़ न होना

कि तुम मेरी दुआ हो, कि तुम मेरी वफ़ा हो

तुम्हें मैं चाँद कहता था, मगर उसमें भी दाग़ है

तुम्हें मैं फूल कहता था, मगर फूलों में खार है

मेरे दिल में भी तुम ही हो, मेरे होठों पे तुम ही हो

कि तुम मेरी दुआ हो, कि तुम मेरी वफ़ा हो मेरा प्रेम पत्र पढ़कर…

शिखाए हैं मोहब्बत के, तुम्हीं ने मुझको दस्तूर

तुम्हीं ने मुझको चमत्कार, दिखाया है ये नूर

मेरे सपनों में तुम ही हो, मेरी यादों में तुम ही हो

कि तुम मेरी दुआ हो, कि तुम मेरी वफ़ा हो मेरा प्रेम पत्र पढ़कर…

बहुत पहले से मैं तुमको, अपना मान चुका हूँ

तुम्हें अपनी ही बाहों का, हार मान चुका हूँ

मेरी साँसों में तुम ही हो, मेरी रातों में तुम ही हो

कि तुम मेरी दुआ हो, कि तुम मेरी वफ़ा हो मेरा प्रेम पत्र पढ़कर…

संस्मरण जब सियासी खत बन जाए हसरत जयपुरी ने लिखा था, “बहुत पहले से मैं तुमको अपना मान चुका हूँ”, लेकिन आज की राजनीति में कोई किसी को अपना मानने को तैयार नहीं है। जनरल नरवणे की किताब, जिसे रक्षा मंत्रालय की मंजूरी का इंतज़ार है, वह खत बन गई है जिसे पढ़ने से पहले ही संसद में हंगामा बरप रहा है।

जब तक इस किताब के पन्ने खुलते नहीं और सरकार चर्चा के लिए तैयार नहीं होती, तब तक लोकतंत्र के इस मंदिर में नाराज़गी का यह गीत गूँजता रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह प्रेम पत्र (संस्मरण) भविष्य में शांति का संदेश लाएगा या टकराव की खाई को और गहरा करेगा।

वैसे इतना तो साफ हो गया है कि ससंद परिसर में एक पुस्तक का सार्वजनिक प्रदर्शन कर राहुल गांधी ने पूरी सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है क्योंकि सरकार की तरफ से इस पुस्तक के अस्तित्व को ही नकारा गया था। दरअसल पुस्तक पहले ही छप चुकी है और सिर्फ सरकार की अनुमति की प्रतीक्षा कर रही है। किताब का जो हिस्सा सार्वजनिक हुआ है, उसमें जनरल नरवणे यह लिखते हुए पाये गये हैं कि भारत सरकार ने उनके हाथ में एक गर्म आलू पकड़ा दिया। इसका अर्थ है युद्ध हुआ और नहीं हुआ दोनों ही स्थिति के लिए सेना प्रमुख ही जिम्मेदार होगा। सरकार ने बार बार अनुरोध किये जाने के बाद भी इस गंभीर विषय पर कोई ठोस फैसला लेने से इंकार दिया था। अब देखिए इस प्रेम पत्र का असर क्या होता है।