अर्थशास्त्र का मानवीकरण आम आदमी की थाली तक
अभिजीत विनायक बनर्जी का अर्थशास्त्र अमूर्त सिद्धांतों या केवल गणितीय आंकड़ों का खेल नहीं है। वे उन वास्तविकताओं की बात करते हैं जिन्हें करोड़ों लोग हर दिन जीते हैं। हैदराबाद लिटरेरी फेस्टिवल के समापन सत्र में उनके द्वारा साझा किए गए विचार न केवल नीति निर्माताओं के लिए एक आईना हैं, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी सोचने का एक नया नजरिया पेश करते हैं।
उनका यह कहना कि अर्थशास्त्र इतना महत्वपूर्ण है कि इसे केवल अर्थशास्त्रियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, इस विषय की गंभीरता और सार्वजनिक जीवन में इसकी पैठ को दर्शाता है। अक्सर यह माना जाता है कि अर्थशास्त्र जटिल है और इसे केवल विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं। बनर्जी इसी धारणा को तोड़ना चाहते हैं।
उनका मानना है कि आर्थिक नीतियां हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती हैं, फिर भी लोग उन पर सवाल नहीं उठाते क्योंकि उन्हें चर्चा में शामिल ही नहीं किया जाता। जब तक आर्थिक विमर्श विशेषज्ञों के बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक मंचों पर नहीं आएगा, तब तक ऐसी नीतियों का निर्माण कठिन है जो वास्तव में समावेशी हों।
भारत में खाद्य सुरक्षा की चर्चा अक्सर पेट भरने यानी अनाज (चावल और गेहूं) तक सीमित रहती है। बनर्जी एक बहुत ही सरल लेकिन अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले समाधान की ओर इशारा करते हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने अनाज की उपलब्धता तो सुनिश्चित की है, लेकिन भारतीय आहार में प्रोटीन की भारी कमी बनी हुई है। हमारा भोजन स्टार्च पर अत्यधिक निर्भर है।
वे सुझाव देते हैं कि नीति निर्माताओं को अब केवल कैलोरी नहीं, बल्कि पोषण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके अलावा, मिलेट्स (मोटे अनाज) को लेकर उनकी राय स्पष्ट है—ये पारंपरिक रूप से सस्ते थे, लेकिन सरकारी समर्थन और मूल्य प्रोत्साहन की कमी ने इन्हें महंगा बना दिया है। यदि नीतियां बदलती हैं, तो मिलेट्स पोषण और वहनीयता का बेहतरीन विकल्प बन सकते हैं।
विकास, शासन और गरीबी की पहेली को सुलझाते हुए बनर्जी ने इस बात पर चिंता जताई कि आय का वितरण लगातार असमान होता जा रहा है। वे कहते हैं कि हमारे पास बहुत अमीर लोगों से संसाधन लेकर उन्हें पुनर्वितरित करने की कोई स्वचालित व्यवस्था नहीं है। गरीबों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले स्कूल और स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है, लेकिन वर्तमान में हम संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
आर्थिक विकास तब तक बेमानी है जब तक वह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार न लाए। भारत के युवाओं में व्याप्त बेरोजगारी और भविष्य की चिंता पर बनर्जी का विश्लेषण गहरा है। वे कहते हैं कि देश की एक बड़ी ऊर्जा सरकारी नौकरी पाने के जुनून में बर्बाद हो रही है। युवाओं में यह गलतफहमी है कि सफलता केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से ही संभव है।
इस चक्कर में युवा अपने जीवन के सबसे उत्पादक वर्ष (अक्सर 27-28 साल की उम्र तक) केवल तैयारी में लगा देते हैं और श्रम बाजार में बहुत देरी से प्रवेश करते हैं। यह न केवल उनके व्यक्तिगत विकास को रोकता है, बल्कि देश के आर्थिक परिदृश्य को भी विकृत करता है। भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए बनर्जी एक कड़वी लेकिन जरूरी सच्चाई पेश करते हैं।
किसानों को दी जाने वाली मुफ्त बिजली एक ऐसे जाल में बदल गई है जिसने जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। पंजाब जैसे क्षेत्रों में चावल का उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो रहा है, जो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए चिंताजनक है। किसान इस व्यवस्था को छोड़ने से डरते हैं क्योंकि उन्हें सरकार पर पर्याप्त मुआवजे का भरोसा नहीं है।
इस भरोसे की कमी को दूर करना और कृषि नीति में आमूल-चूल बदलाव करना अनिवार्य हो गया है। अभिजीत बनर्जी के विचार स्पष्ट करते हैं कि अर्थशास्त्र को बाजार और मुनाफे के चश्मे से हटाकर मानवीय गरिमा और समान अवसर के धरातल पर लाना होगा। चाहे वह बैंकिंग क्षेत्र में आम आदमी को बेहतर रिटर्न देने की बात हो या कृषि और रोजगार के संकट को सुलझाने की, समाधान केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और पारदर्शी शासन में छिपा है।
यदि हम वास्तव में एक न्यायसंगत समाज बनाना चाहते हैं, तो अर्थशास्त्र को हर नागरिक की भाषा और उसकी चिंताओं का हिस्सा बनाना होगा। उनका यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद में पेश बजट की स्थिति अंधों द्वारा हाथी को पहचानने जैसी बनी हुई है। इसमें ऐसी स्पष्टता नहीं है जो आम आदमी को उसका फायदा या नुकसान समझा सके। लिहाजा आम आदमी तक इन बातों को सरलता से ले जाना भी देश की अर्थनीति के लिए आवश्यक है न कि जटिल शब्दावली के जंजाल में ऐसी जुगाली करना, जो आम आदमी की समझ से परे हो।