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जनता की डिजिटल सुरक्षा भी सरकारी जिम्मेदारी

वर्तमान दौर में जहाँ डिजिटल तकनीक ने हमारे जीवन को सुगम बनाया है, वहीं इसने डिजिटल अरेस्ट जैसे नए और भयावह अपराधों को भी जन्म दिया है। जन-जागरूकता में वृद्धि और न्यायिक हस्तक्षेप के बावजूद, डिजिटल अरेस्ट के मामलों में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। हाल ही में दिल्ली के एक बुजुर्ग दंपत्ति, तनेजा परिवार के साथ हुई करीब 15 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।

यह घटना न केवल वित्तीय हानि का उदाहरण है, बल्कि यह उस मनोवैज्ञानिक आतंक को भी दर्शाती है जिसे साइबर अपराधी आज एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। दिल्ली के रहने वाले बुजुर्ग तनेजा दंपत्ति ने करीब 15 करोड़ रुपये की अपनी जीवन भर की जमा पूंजी गंवा दी। जालसाजों ने खुद को दूरसंचार विभाग और कानून प्रवर्तन एजेंसियों का अधिकारी बताकर उन्हें हफ्तों तक वर्चुअल बंधक बनाकर रखा।

अपराधियों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वे एक गंभीर अपराध की जांच का हिस्सा हैं और उन्हें घर से बाहर निकलने या किसी को सूचित करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। अब यह दंपत्ति इस बात पर पछतावा कर रहा है कि उन्होंने शुरुआत में ही पुलिस को सूचित क्यों नहीं किया। उनकी यह सबसे बड़ी गलती आज समाज के हर नागरिक के लिए एक चेतावनी की तरह है।

यह मामला विशेष रूप से विचलित करने वाला इसलिए है क्योंकि इसमें केवल धन की लूट नहीं हुई, बल्कि पीड़ितों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रहार किया गया। दो सप्ताह से अधिक समय तक, बुजुर्ग दंपत्ति को ऑडियो और वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क में रहने के लिए मजबूर किया गया। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर शारीरिक गिरफ्तारी की धमकी दी गई और उन पर मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) और आतंकवाद से जुड़े अपराधों के झूठे आरोप लगाए गए।

अपराधियों ने दो अकेले और शारीरिक रूप से कमजोर बुजुर्गों की स्थिति का निर्दयतापूर्वक फायदा उठाया, जिनके बच्चे विदेश में बसे हुए हैं। यह कोई सामान्य धोखाधड़ी नहीं थी—यह एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक युद्ध था। अपराधी जानते थे कि अकेलेपन और डर के मिश्रण से किसी भी व्यक्ति के विवेक को शून्य किया जा सकता है।

भारतीय अधिकारियों और पुलिस ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि भारत के किसी भी कानून में वीडियो कॉल के माध्यम से गिरफ्तारी का कोई प्रावधान नहीं है। पुलिस या कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी वीडियो कॉल पर किसी को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती है। बावजूद इसके, अपराधी जिस तरह का भ्रम पैदा करते हैं, वह अविश्वसनीय रूप से वास्तविक लगता है।

वे पुलिस की वर्दी पहनते हैं, उनके पीछे का बैकग्राउंड सरकारी कार्यालय जैसा दिखता है, वे कानूनी शब्दावली का उपयोग करते हैं और यहाँ तक कि फर्जी सुप्रीम कोर्ट की मोहरें और दस्तावेज भी दिखाते हैं। जब इस तरह का नाटक कई दिनों तक चलता है, तो डर के मारे अच्छे-भले इंसान की सामान्य बुद्धि काम करना बंद कर देती है।

लगभग एक महीने पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई (CBI) को डिजिटल अरेस्ट घोटालों की राष्ट्रव्यापी जांच सौंपने का निर्णय लिया था। हालांकि, यह कदम भी अपराधियों के मन में डर पैदा करने में विफल रहा है। इसका अर्थ है कि केवल पुलिसिंग से इस खतरे को नहीं रोका जा सकता। सुरक्षा की पहली पंक्ति जागरूकता है, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों के लिए।

परिवारों को अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर साइबर खतरों के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए। बैंकों को संदिग्ध और भारी निकासी के लिए अपने रेड-फ्लैग (चेतावनी) तंत्र को और अधिक मजबूत बनाना चाहिए। यदि किसी बुजुर्ग के खाते से अचानक बड़ी रकम कई किश्तों में निकल रही है, तो बैंक को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।

तनेजा दंपत्ति ने अपनी जीवन भर की बचत खो दी, लेकिन उनका अनुभव दूसरों की जान और माल बचा सकता है। किसी भी संदिग्ध कॉल की सूचना तुरंत 1930 (साइबर हेल्पलाइन) या स्थानीय पुलिस को देना अनिवार्य है। डिजिटल आतंक के इस युग में, पुलिस और जनता के बीच का तालमेल ही एकमात्र बचाव है।

हमें यह समझना होगा कि कानून डर नहीं, बल्कि सुरक्षा का नाम है। यदि कोई आपको वीडियो कॉल पर डरा रहा है, तो वह कानून का रक्षक नहीं बल्कि एक अपराधी है। एक समय पर की गई फोन कॉल न केवल आपकी मेहनत की कमाई बचा सकती है, बल्कि अपराधियों के इस खतरनाक जाल को भी तोड़ सकती है। अंत में यह भी समझना होगा कि यह सरकार की भी जिम्मेदारी है क्योंकि जिस जनता के पैसे से सरकार का सारा तामझाम चलता है, उसकी जिम्मेदारी भी किसी और की नहीं हो सकती। दूसरे योजनाओँ के प्रचार प्रसार पर जो धन सरकार खर्च करती है, उसका कुछ हिस्सा इस पर खर्च होना चाहिए।