ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस और मध्य पूर्व का नया समीकरण
वाशिंगटनः डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा गाज़ा के भविष्य और मध्य पूर्व में दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से गठित बोर्ड ऑफ पीस (शांति बोर्ड) वर्तमान में वैश्विक कूटनीति का सबसे चर्चित विषय बन गया है। पिछले 8 घंटों के भीतर इस घटनाक्रम में एक ऐतिहासिक मोड़ तब आया, जब संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने इस बोर्ड में सक्रिय रूप से शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण स्वीकार कर लिया। यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक भागीदारी नहीं है, बल्कि यह मध्य पूर्व की दशकों पुरानी भू-राजनीतिक बिसात पर एक बहुत बड़े बदलाव का स्पष्ट संकेत देता है।
बोर्ड ऑफ पीस का प्राथमिक एजेंडा गाज़ा के व्यापक पुनर्निर्माण और वहाँ एक नई, स्थिर प्रशासनिक व्यवस्था को स्थापित करने के इर्द-गिर्द बुना गया है। इस पहल के माध्यम से ट्रंप प्रशासन का मुख्य उद्देश्य अरब देशों, विशेष रूप से खाड़ी देशों से भारी निवेश जुटाना है। ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र के उन पुराने और अप्रभावी नौकरशाही तरीकों से पूरी तरह अलग होगी, जो दशकों से इस विवाद का समाधान निकालने में विफल रहे हैं। इसके बजाय, यह बोर्ड एक बिजनेस-लीड (व्यापार-आधारित) समाधान की वकालत कर रहा है, जहाँ आर्थिक लाभ और विकास को शांति के मुख्य आधार के रूप में देखा जा रहा है।
इस पूरे समीकरण में संयुक्त अरब अमीरात की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक है। यूएई न केवल अपार वित्तीय संसाधनों और निवेश क्षमता का स्वामी है, बल्कि उसने अब्राहम समझौता के माध्यम से इजरायल के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाकर एक अद्वितीय कूटनीतिक संतुलन हासिल किया है। यूएई के पास वह क्षमता है कि वह इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को समझते हुए अन्य अरब देशों के साथ समन्वय स्थापित कर सके। उसकी भागीदारी इस बोर्ड को वह विश्वसनीयता प्रदान करती है, जिसकी कमी पहले महसूस की जा रही थी।
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी योजना के मार्ग में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और राजनीतिक आलोचकों का एक बड़ा वर्ग यह तर्क दे रहा है कि यह बोर्ड मौजूदा फिलिस्तीनी नेतृत्व और उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं की पूरी तरह अनदेखी कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि आर्थिक पैकेज कभी भी पूर्ण राजनीतिक संप्रभुता का विकल्प नहीं हो सकते।
इसके अतिरिक्त, इस क्षेत्र की सबसे बड़ी शक्ति, सऊदी अरब, ने अभी तक इस बोर्ड पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। लेकिन कूटनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि यूएई के इस साहसी कदम के बाद रियाद पर भी अपनी चुप्पी तोड़ने और इस प्रक्रिया में शामिल होने का दबाव काफी बढ़ गया है।
बोर्ड की आगामी बैठकों का एजेंडा भी काफी स्पष्ट और तकनीकी है। इसमें मुख्य रूप से गाज़ा के भीतर एक सुरक्षा क्षेत्र (Security Zone) के निर्माण पर चर्चा होगी, ताकि वहां फिर से उग्रवाद की जड़ें न पनप सकें। साथ ही, मानवीय सहायता और व्यापारिक गतिविधियों के लिए नए और आधुनिक कॉरिडोर विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।
अमेरिका का अंतिम लक्ष्य गाज़ा को एक युद्धग्रस्त मलबे के ढेर से बदलकर उसे एक आधुनिक आर्थिक हब के रूप में पुनर्जीवित करना है। इस योजना की सफलता इस बात पर टिकी है कि अरब दुनिया के निजी निवेशक इसमें कितनी रुचि दिखाते हैं और क्या यह आर्थिक मॉडल क्षेत्रीय संघर्षों की कड़वाहट को कम कर पाएगा।