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ट्रम्प की वापसी और अस्थिर होती विश्व-व्यवस्था

डोनाल्ड ट्रम्प का वैश्विक राजनीति के केंद्र में पुनः सक्रिय होना दुनिया के लिए किसी भू-राजनीतिक भूकंप से कम नहीं है। अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में उनकी संभावित नीतियों और हालिया बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंध कूटनीति से अधिक दबाव और टकराव की भेंट चढ़ने वाले हैं।

वेनेजुएला में निकोलस मादुरो के साथ पुराना गतिरोध हो, ग्रीनलैंड को खरीदने जैसी बेतुकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा हो, या ईरान में आंतरिक हिंसा को हवा देने की रणनीति—ट्रम्प की अमेरिका फर्स्ट नीति वास्तव में ग्लोबल डिसऑर्डर (वैश्विक अव्यवस्था) का पर्याय बनती जा रही है।

वेनेजुएला और लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप ट्रम्प की विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा शासन परिवर्तन की कोशिशों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। वेनेजुएला में निकोलस मादुरो की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए उन्होंने न केवल कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, बल्कि वहां के आंतरिक राजनीतिक संघर्ष को भी हवा दी। मादुरो को एक तानाशाह घोषित कर ट्रम्प ने विपक्षी नेताओं को जिस तरह खुला समर्थन दिया, उसने पूरे लैटिन अमेरिका में अस्थिरता पैदा की।

ट्रम्प की यह कार्यशैली लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के बजाय संसाधनों पर नियंत्रण और रणनीतिक प्रभुत्व की अधिक लगती है। उनके इस रुख ने वेनेजुएला में मानवीय संकट को और गहरा किया है, जिससे लाखों लोग पलायन करने पर मजबूर हुए हैं। आधुनिक युग में साम्राज्यवादी हठ ट्रम्प की कार्यप्रणाली का सबसे विचित्र और विवादास्पद पहलू ग्रीनलैंड को खरीदने की उनकी इच्छा रही है।

एक संप्रभु राष्ट्र (डेनमार्क) के हिस्से को रीयल एस्टेट की तरह खरीदने की बात करना न केवल राजनयिक शिष्टाचार का उल्लंघन है, बल्कि यह 21वीं सदी में औपनिवेशिक मानसिकता के पुनरुत्थान को भी दर्शाता है। उनके इस रवैये ने नॉर्डिक देशों और अमेरिका के बीच दशकों पुराने भरोसे को हिलाकर रख दिया।

ग्रीनलैंड जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण द्वीप को केवल सैन्य और संसाधन की दृष्टि से देखना यह बताता है कि ट्रम्प के लिए अंतरराष्ट्रीय संधियां और राष्ट्रों की संप्रभुता कोई मायने नहीं रखती। यह लेन-देन वाली विदेश नीति वैश्विक सुरक्षा ढांचे के लिए एक बड़ा खतरा है। ईरान के प्रति ट्रम्प का दृष्टिकोण हमेशा से ही विस्फोटक रहा है।

परमाणु समझौते से एकतरफा हटने के बाद उन्होंने ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई। हाल के दिनों में, ईरान के भीतर हो रहे विरोध प्रदर्शनों और हिंसा को जिस तरह ट्रम्प और उनके सहयोगियों ने उकसाया है, उसने मध्य-पूर्व को एक नए युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

कासिम सुलेमानी की हत्या से शुरू हुआ यह सिलसिला अब ईरान के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिशों तक पहुंच गया है। ट्रम्प की बयानबाजी ने ईरान के कट्टरपंथियों को और मजबूत किया है, जिससे कूटनीति के सारे रास्ते बंद होते दिख रहे हैं। यदि ईरान में अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

बिखरती विश्व-व्यवस्था और भविष्य की चुनौतियां ट्रम्प की आक्रामक कार्यशैली ने संयुक्त राष्ट्र, नाटो और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बहुपक्षवाद को त्यागकर अकेले चलो की नीति अपनाता है, तो छोटे और विकासशील देशों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।

ट्रम्प की हरकतें रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को अपनी विस्तारवादी नीतियां चलाने का नैतिक बहाना देती हैं। आज दुनिया को एक ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो संघर्षों को सुलझाए, न कि उन्हें भड़काए। ट्रम्प का मैडमैन थ्योरी पर आधारित शासन वैश्विक शांति के लिए महंगा साबित हो सकता है।

पर्यावरण परिवर्तन, महामारी और परमाणु प्रसार जैसे मुद्दों पर वैश्विक सहयोग की जरूरत है, लेकिन ट्रम्प की नीतियां दुनिया को बांटने का काम कर रही हैं। यदि विश्व समुदाय ने समय रहते इस अस्थिरता को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए, तो अराजकता का यह दौर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अंधकारमय भविष्य छोड़ जाएगा।

ट्रम्प की राजनीति केवल अमेरिका के भीतर ध्रुवीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर असुरक्षा और अनिश्चितता का एक ऐसा चक्र पैदा कर रही है, जिससे निकलना आसान नहीं होगा। मादुरो, ग्रीनलैंड और ईरान तो केवल बानगी हैं; असली खतरा उस विश्व-व्यवस्था के ढहने का है जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बड़ी मुश्किल से बनाया गया था।

इससे दुनिया के लोकतंत्र को भी खतरा हो रहा है, जहां जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत को डोनाल्ड ट्रंप चरितार्थ कर रहे हैं। इसके पहले भी इराक सहित कई देशों में झूठे आरोप लगाकर किये गये हमलों का इतिहास हमारे सामने मौजूद है। दूसरी तरफ जहां रूस जैसा मजबूत प्रतिद्वंद्वि खड़ा है, उस यूक्रेन युद्ध के मोर्चे पर ट्रंप का तेवर बदला बदला है। यह दुनिया के लिए शुभ संकेत कतई नहीं है।