सूचना के अधिकार से हुआ बैंकिंग मतभेदों का खुलासा
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारतीय बैंकिंग जगत में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच एक बड़ा कानूनी संघर्ष छिड़ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक और देश के चार प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों—भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, आरबीएल बैंक और यस बैंक—के बीच सूचना के अधिकार के तहत संवेदनशील डेटा साझा करने को लेकर उपजा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय सूचना आयोग ने इसे एक बड़ी बेंच को सौंपने का निर्णय लिया है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब धीरज मिश्रा, गिरिश मित्तल और अन्य आरटीआई आवेदकों ने आरबीआई से बैंकों की कार्यप्रणाली से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मांगीं। इन मांगों में बैंकों के शीर्ष 100 एनपीए की सूची, ऋण चुकाने में सक्षम होने के बावजूद जानबूझकर चूक करने वाले ‘विलफुल डिफॉल्टर’ के नाम, आरबीआई द्वारा की गई बैंकों की गुप्त निरीक्षण रिपोर्ट और वैधानिक खामियों के कारण लगाए गए करोड़ों रुपये के जुर्माने से संबंधित दस्तावेज शामिल थे। केंद्रीय बैंक ने आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों के तहत इन रिकॉर्ड्स को प्रकटीकरण के योग्य माना और इन्हें सार्वजनिक करने की अनुमति दे दी। हालांकि, संबंधित बैंकों ने इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह जानकारी साझा करना व्यावसायिक गोपनीयता और ग्राहक विश्वास का उल्लंघन होगा।
सूचना आयुक्त खुशवंत सिंह सेठी ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि मामला केवल कुछ बैंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध बैंकिंग प्रणाली की अखंडता और जमाकर्ताओं के अधिकारों से है। चूंकि पूर्व में भी इसी तरह के मामले दोहरी बेंच द्वारा सुने गए थे, इसलिए इस बार भी मामले को मुख्य सूचना आयुक्त के पास एक बड़ी बेंच के गठन हेतु भेजा गया है। जब तक यह बड़ी बेंच अपना अंतिम फैसला नहीं सुना देती, तब तक उक्त जानकारियों को सार्वजनिक करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।
यह कानूनी लड़ाई भारतीय वित्तीय क्षेत्र के लिए एक मिसाल साबित होगी। यदि सीआईसी का फैसला पारदर्शिता के पक्ष में आता है, तो बैंकों के लिए अपनी विफलताओं या बड़े बकायेदारों के नाम छुपाना मुश्किल हो जाएगा, जिससे सार्वजनिक जवाबदेही बढ़ेगी। वहीं दूसरी ओर, बैंकों का तर्क है कि इस तरह के खुलासे से उनकी बाजार स्थिति और ग्राहकों के हितों को नुकसान पहुंच सकता है। वर्तमान में, जब देश में एनपीए और नियामक चूक जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं, यह निर्णय भविष्य की बैंकिंग जवाबदेही की दिशा तय करने में मील का पत्थर साबित होगा।