पश्चिम बंगाल की राजनीति में 8 जनवरी की सुबह अन्य दिनों की तरह ही सामान्य और शांत प्रतीत हो रही थी, लेकिन किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ ही घंटों में कोलकाता की गलियां एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक युद्ध का अखाड़ा बन जाएंगी। केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की एक छोटी सी छापेमारी ने देखते ही देखते राज्य प्रशासन, पुलिस, वरिष्ठ मंत्रियों और स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सड़क पर उतार दिया।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर केंद्र और राज्य के बीच के उन गहरे मतभेदों को सतह पर ला दिया है, जो अक्सर चुनावी मौसम के करीब आते ही उग्र हो जाते हैं। 8 जनवरी की तड़के ईडी की टीमों ने कोयला तस्करी से जुड़े धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) के मामले में साल्टलेक, बिधाननगर और कोलकाता के विभिन्न ठिकानों पर एक साथ दबिश दी।
केंद्रीय एजेंसी का मुख्य लक्ष्य चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक का कार्यालय, इस संस्था के प्रमुख प्रतीक जैन का आवास और शहर के बाजार इलाके में स्थित कुछ अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान थे। ईडी का दावा है कि पूर्वी भारत में सक्रिय कोयला तस्करी गिरोह का अवैध पैसा मुखौटा कंपनियों और दलालों के माध्यम से विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुँचा है।
एजेंसी का तर्क है कि यह एक पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया थी जिसका उद्देश्य उस ट्रेल को पकड़ना था, जिससे अवैध धन का हस्तांतरण हुआ। ईडी ने स्पष्ट किया कि इस छापेमारी का राजनीति या आने वाले चुनावों से कोई सरोकार नहीं है। जैसे ही यह खबर फैली कि प्रतीक जैन के घर और आई-पैक के दफ्तर में जांच चल रही है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने असामान्य कदम उठाते हुए सीधे मोर्चा संभाल लिया।
प्रतीक जैन से संपर्क न हो पाने पर मुख्यमंत्री स्वयं उनके आवास पर पहुँच गईं। मुख्यमंत्री के इस कदम ने न केवल सुरक्षा अधिकारियों को चकित कर दिया, बल्कि प्रशासनिक हलकों में भी हड़कंप मचा दिया। मुख्यमंत्री के साथ-साथ राज्य पुलिस के आला अफसर और भारी संख्या में समर्थक भी वहां जमा हो गए।
घर से बाहर निकलते ही ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि ईडी केवल कोयला तस्करी की जांच नहीं कर रही, बल्कि वह तृणमूल कांग्रेस का डाटा बैंक, संवेदनशील दस्तावेज, हार्ड डिस्क और आगामी चुनाव की रणनीतियों को चुराने आई है। ममता ने सवाल किया, क्या यह चुनाव से पहले हमारी पार्टी को पंगु बनाने की कोशिश नहीं है?
यदि हमारे सारे चुनावी आंकड़े और रणनीतियां कॉपी कर ली जाएंगी, तो हम चुनाव कैसे लड़ेंगे? उन्होंने आरोप लगाया कि ईडी ने फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मदद से आई-पैक के गोपनीय डेटा को क्लोन कर लिया है। ममता बनर्जी ने आई-पैक के दफ्तर के बाहर मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि सुबह की छापेमारी के दौरान ऑफिस में कोई कर्मचारी नहीं था, जिसका फायदा उठाकर फाइलों को खंगाला गया।
उन्होंने बेहद व्यथित होते हुए कहा, आज टेबल खाली पड़े हैं। जो दस्तावेज और डेटा गायब किए गए हैं, उन्हें फिर से तैयार करने में इतना समय लगेगा कि तब तक चुनाव ही निकल जाएंगे। मुख्यमंत्री का यह बयान स्पष्ट करता है कि वह इस कार्रवाई को केवल एक कानूनी जांच के रूप में नहीं, बल्कि सीधे अपने चुनावी तंत्र पर प्रहार के रूप में देख रही हैं।
दूसरी ओर, ईडी ने एक जवाबी बयान जारी कर ममता बनर्जी के आरोपों को निराधार बताया। एजेंसी ने कहा कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह शांतिपूर्ण और नियमानुसार चल रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री के अचानक आगमन और उनके समर्थकों के हस्तक्षेप के कारण जांच में बाधा आई। ईडी ने यह भी आरोप लगाया कि इस हंगामे के दौरान कुछ महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और दस्तावेज मौके से हटा दिए गए। इस गतिरोध के बाद ईडी ने मामले को कोलकाता हाई कोर्ट ले जाने का निर्णय लिया है।
इस घटना ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से ध्रुवीकृत कर दिया है। वहीं, भाजपा ने मुख्यमंत्री के इस कदम को असंवैधानिक बताया है। कोलकाता की सड़कों पर दिखा यह नजारा कई मायनों में 2019 के उस घटनाक्रम की याद दिलाता है, जब तत्कालीन पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर सीबीआई की छापेमारी के विरोध में ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई थीं।
फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार युद्ध का केंद्र व्यक्ति नहीं बल्कि डेटा और चुनावी रणनीति है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि हाई कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या यह छापेमारी तृणमूल के चुनावी अभियान को वाकई कोई नुकसान पहुँचा पाती है या ममता बनर्जी इस घटना को एक चुनावी अवसर में बदलकर जनता के बीच सहानुभूति हासिल करने में सफल रहती हैं।