ट्रंप का ग्रीनलैंड मिशन पुनर्जीवित
वाशिंगटनः नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में अपनी वापसी के साथ ही एक बार फिर उस विवादित मुद्दे को हवा दे दी है जिसने उनके पिछले कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचाई थी। ट्रंप ने आधिकारिक बयानों और सोशल मीडिया के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि वह ग्रीनलैंड को खरीदने या उसे अमेरिकी नियंत्रण में लेने की अपनी पुरानी योजना पर अडिग हैं।
ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड केवल एक विशाल बर्फ का टुकड़ा नहीं है, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति और वहां छिपे दुर्लभ खनिज संसाधन अमेरिका की आगामी सदी की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक भविष्य के लिए अति आवश्यक हैं। उनके अनुसार, यह सौदा अमेरिका के लिए 21वीं सदी की लुइसियाना खरीद जैसा साबित हो सकता है।
इस रणनीति के पीछे का सबसे बड़ा कारण आर्कटिक क्षेत्र में बदलता भू-राजनीतिक समीकरण है। जलवायु परिवर्तन के कारण ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है, जिससे नए व्यापारिक मार्ग और तेल व गैस के भंडार सुलभ हो रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि इस क्षेत्र में रूस की बढ़ती सैन्य उपस्थिति और चीन के पोलर सिल्क रोड के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ग्रीनलैंड पर पूर्ण अमेरिकी संप्रभुता या कम से कम एक विशाल सैन्य उपस्थिति अनिवार्य है। ट्रंप का मानना है कि ग्रीनलैंड को डेनमार्क द्वारा वित्तीय बोझ के रूप में देखा जाना चाहिए, जबकि अमेरिका इसे एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में विकसित कर सकता है।
हालांकि, डेनमार्क की सरकार और ग्रीनलैंड की स्थानीय स्वायत्त सरकार ने इस विचार को सिरे से खारिज करते हुए इसे अतार्किक, औपनिवेशिक सोच और अपमानजनक बताया है। डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है, और वह कोई वस्तु नहीं बल्कि एक गौरवशाली राष्ट्र का हिस्सा है। दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि वे इस पर डेनमार्क के साथ एक बड़ा रणनीतिक सौदा करने को तैयार हैं, जिसमें अरबों डॉलर की वित्तीय सहायता और निवेश पैकेज शामिल हो सकते हैं।
सैन्य और राजनीतिक विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इस प्रकार की आक्रामक बयानबाजी से नाटो गठबंधन के भीतर गहरी दरार पैदा हो सकती है। ग्रीनलैंड की स्थानीय जनता ने भी अपनी संप्रभुता के साथ किसी भी प्रकार के समझौते का कड़ा विरोध करते हुए प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं।
कोपेनहेगन और वाशिंगटन के बीच का यह तनाव न केवल द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि यह यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच एक नई कूटनीतिक जंग का सूत्रपात भी कर सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप इस मुद्दे पर केवल दबाव बना रहे हैं या वे वास्तव में किसी वैश्विक सीमा परिवर्तन की तैयारी में हैं।