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कृत्रिम सूरज और फ्यूजन एनर्जी में कामयाबी मिली

भविष्य की असीमित ऊर्जा की दिशा में एक महाक्रांति

  • चीन और यूरोपीय संघ के वैज्ञानिकों का प्रयास

  • प्रयोगशाला में 135 मिलियन डिग्री तापमान

  • पर्यावरण बचाने की दिशा में बड़ा कदम होगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दिसंबर 2025 में विज्ञान की दुनिया से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी मानवता के लिए ऊर्जा संकट के स्थायी समाधान की उम्मीद जगा दी है। चीन और यूरोपीय संघ के वैज्ञानिकों के एक संयुक्त दल ने न्यूक्लियर फ्यूजन (नाभिकीय संलयन) के क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया है। उनके प्रायोगिक उन्नत सुपरकंडक्टिंग टोकामक जिसे आम भाषा में कृत्रिम सूरज कहा जाता है, ने 135 मिलियन डिग्री सेल्सियस के अविश्वसनीय तापमान को लगभग 20 मिनट (1200 सेकंड) से अधिक समय तक स्थिर रखने में सफलता प्राप्त की है।

वास्तविक सूर्य के केंद्र में ऊर्जा उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहा जाता है। इसमें हाइड्रोजन के परमाणु अत्यधिक उच्च ताप और दबाव पर आपस में जुड़कर हीलियम बनाते हैं, जिससे विशाल मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। पृथ्वी पर इसी प्रक्रिया को दोहराना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि इसके लिए करोड़ों डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है। 135 मिलियन डिग्री सेल्सियस का यह तापमान सूर्य के केंद्र (जो लगभग 15 मिलियन डिग्री है) से भी 9 गुना अधिक गर्म है। अतीत में, वैज्ञानिक ऐसा तापमान हासिल तो कर लेते थे, लेकिन उसे कुछ ही सेकंड के लिए बनाए रख पाते थे। इस बार की सबसे बड़ी उपलब्धि निरंतरता है। 20 मिनट तक इस प्लाज्मा को स्थिर रखना यह साबित करता है कि अब हम इस ऊर्जा को बिजली संयंत्रों में बदलने के बहुत करीब पहुंच गए हैं।

संलयन के लिए आवश्यक ईंधन (ड्यूटेरियम) समुद्र के पानी से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। शून्य कार्बन उत्सर्जन: यह प्रक्रिया कोयले या गैस की तरह ग्रीनहाउस गैसें पैदा नहीं करती, जिससे ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने में मदद मिलेगी। न्यूनतम वर्तमान परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के विपरीत, फ्यूजन तकनीक में खतरनाक रेडियोधर्मी कचरा बहुत कम मात्रा में पैदा होता है और दुर्घटना का खतरा लगभग शून्य होता है।

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इस ऐतिहासिक सफलता ने इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर परियोजना को नई गति दी है। यदि यह तकनीक व्यावसायिक रूप से सफल होती है, तो आने वाले दशकों में दुनिया को प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी। यह न केवल विज्ञान की जीत है, बल्कि पृथ्वी के पर्यावरण को बचाने की दिशा में सबसे साहसी कदम भी है।

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