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डोनाल्ड ट्रंप की नई दवा नीति से हलचल

भारत सहित कई देशों पर इस फैसला का प्रतिकूल असर होगा

वाशिंगटनः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के एक सबसे बड़े और साहसिक नीतिगत बदलाव की घोषणा करते हुए स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप ने दावा किया है कि उनकी सरकार ने प्रमुख वैश्विक दवा निर्माता कंपनियों के साथ एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व समझौता किया है।

इस समझौते का मुख्य केंद्र बिंदु अमेरिका में जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों में 40 प्रतिशत तक की भारी कटौती करना है। ट्रंप का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि अमेरिकी नागरिक दुनिया के अन्य विकसित देशों की तुलना में दवाओं के लिए बहुत अधिक और अनुचित भुगतान करते हैं। उन्होंने इस नई नीति को अपने अमेरिका फर्स्ट एजेंडे का एक अनिवार्य हिस्सा बताया है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों की जेब पर पड़ रहे बोझ को कम करना है।

इस नीति के केंद्र में मेडिकेड और मेडिकेयर जैसे सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम हैं। यदि यह नीति पूर्ण रूप से लागू होती है, तो इसका सबसे प्रत्यक्ष और बड़ा लाभ अमेरिका के करोड़ों बुजुर्गों, विकलांगों और कम आय वाले परिवारों को मिलेगा, जो अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा दवाओं पर खर्च करते हैं। राष्ट्रपति का कहना है कि दवा कंपनियों को दी जाने वाली भारी सब्सिडी और पेटेंट संरक्षण के बदले उन्हें अमेरिकी जनता को सस्ती दवाएं उपलब्ध करानी ही होंगी।

हालांकि, इस घोषणा ने बड़ी दवा कंपनियों के साथ एक सीधा टकराव मोल ले लिया है। दवा उद्योग के प्रतिनिधियों और लॉबिस्टों ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है। उनका तर्क है कि कीमतों को जबरन और कृत्रिम रूप से कम करने से फार्मा कंपनियों के मुनाफे में कमी आएगी, जिसका सीधा और नकारात्मक असर भविष्य में होने वाले नए शोध, दवाओं के परीक्षण और नवाचार पर पड़ेगा।

कंपनियों का कहना है कि इससे कैंसर और अल्जाइमर जैसी लाइलाज बीमारियों के लिए खोजी जा रही दवाओं की गति धीमी हो जाएगी। इस घोषणा के तुरंत बाद वैश्विक शेयर बाजारों में फार्मास्युटिकल कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

राजनीतिक विश्लेषक इस कदम को आगामी मध्यावधि चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। ट्रंप का यह दांव मध्यम वर्ग और कामकाजी परिवारों को लुभाने के लिए एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है, जो बढ़ती स्वास्थ्य लागतों से परेशान हैं। यदि अमेरिका जैसा बड़ा बाजार दवाओं की कीमतें घटाने में सफल रहता है, तो इसका असर वैश्विक स्तर पर पड़ेगा।

कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिकी बाजार के मुनाफे पर निर्भर हैं, और यहाँ की कीमतों में बदलाव पूरी दुनिया में दवाओं के मूल्य निर्धारण के समीकरणों को बदल कर रख देगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि कानूनी चुनौतियों और फार्मा लॉबी के दबाव के बीच ट्रंप इस नीति को कितनी जमीन पर उतार पाते हैं।