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ट्रंप का तानाशाही तेवर वैश्विक खतरा

साल 2026 अभी शुरू ही हुआ है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक अलग ही आक्रामक तेवर में नजर आ रहे हैं। शनिवार, 3 जनवरी को उन्होंने दुनिया को उस वक्त स्तब्ध कर दिया जब उन्होंने वेनेजुएला पर सैन्य हमले और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी के अपहरण का आदेश दे दिया।

इसके तुरंत बाद उन्होंने तेल समृद्ध इस देश पर अमेरिकी नियंत्रण की घोषणा कर दी। अभी वेनेजुएला संकट की धूल शांत भी नहीं हुई थी कि सोमवार को व्हाइट हाउस के सलाहकार स्टीफन मिलर ने टेलीविजन पर एक और चौंकाने वाला बयान दे दिया। मिलर ने कहा कि ग्रीनलैंड पर सही मायने में अमेरिका का अधिकार है और ट्रंप प्रशासन जब चाहे इस डैनिश क्षेत्र पर कब्जा कर सकता है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका सैन्य बल के इस्तेमाल से इनकार करेगा, तो मिलर ने दो टूक कहा, ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर कोई भी सैन्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका से नहीं लड़ने वाला। ट्रंप ने घोषणा की कि कमांडर-इन-चीफ के रूप में उनकी शक्तियां केवल उनकी अपनी नैतिकता से बंधी हैं।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नियंत्रणों को खारिज करते हुए कहा कि ये दुनिया भर के देशों पर हमला करने या उन्हें मजबूर करने की उनकी क्षमता को नहीं रोक सकते। नैतिकता की यह बात उस व्यक्ति की ओर से आना थोड़ा अजीब था, जो खुद जेफरी एपस्टीन से जुड़े यौन दुराचार के आरोपों का सामना कर चुका है।

ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका तब तक वेनेजुएला का प्रभारी बना रहेगा जब तक वह चाहेंगे, और यह अवधि कई वर्षों की हो सकती है। उन्होंने वेनेजुएला के 30-50 मिलियन बैरल तेल (कीमत लगभग 2.8 बिलियन डॉलर) को जब्त करने और उसे रिफाइन करने की योजना की पुष्टि की।

ट्रंप ने कहा कि वे इस धन पर नियंत्रण रखेंगे और इसका उपयोग वेनेजुएला और अमेरिका के लोगों के लिए करेंगे। ग्रीनलैंड के मामले में ट्रंप किसी भी लीज या संधि से संतुष्ट नहीं होने वाले हैं; उन्हें उस द्वीप का पूर्ण स्वामित्व चाहिए। ट्रंप का मानना है कि सफलता के लिए किसी क्षेत्र का भौतिक कब्जा मनोवैज्ञानिक रूप से आवश्यक है। शनिवार को उन्होंने नाटो को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया और कहा, अगर इससे नाटो प्रभावित होता है, तो होने दें। उन्हें हमारी जरूरत हमसे कहीं ज्यादा है।

66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से विदाई गुरुवार को ट्रंप ने अपनी सरकार को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से हटने का निर्देश दिया, जिन्हें वे अमेरिकी हितों के विरुद्ध मानते हैं। इस सूची में 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध निकाय शामिल हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण 1992 का जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन, 2015 का पेरिस जलवायु समझौता, यूएन वीमेन, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन हैं।

यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ऐसा किया है। 2020 में उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका को बाहर कर दिया था, जिसे बाद में बाइडेन प्रशासन ने बहाल किया। लेकिन 20 जनवरी 2025 को कार्यभार संभालते ही ट्रंप ने फिर से डब्ल्यूएचओ से हटने के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए।

फरवरी 2025 में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, यूनेस्को और फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संस्था से भी किनारा कर लिया था। हैरानी की बात यह है कि इस सूची में इंटरनेशनल सोलर एलायंस भी शामिल है, जिसका मुख्यालय गुरुग्राम (भारत) में है और जिसे भारत और फ्रांस ने मिलकर शुरू किया था।

चूंकि ट्रंप अमेरिका में जीवाश्म ईंधन (तेल और गैस) को बढ़ावा दे रहे हैं और नवीकरणीय ऊर्जा से मुंह मोड़ चुके हैं, इसलिए आईएसए से उनका हटना अप्रत्याशित नहीं था। ट्रंप का मानना है कि उनकी सैन्य और आर्थिक शक्ति के आगे छोटे देश अपने आप झुक जाएंगे। यह कदम काफी हद तक उनके मागा समर्थक आधार को खुश करने के लिए उठाया गया है, जो वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप से थोड़ा नाराज थे क्योंकि वे विदेशों में अमेरिकी सेना के उलझने के खिलाफ रहे हैं।

हालांकि, अपनी पूरी बयानबाजी के बावजूद, ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, महासभा, विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से हटने का फैसला नहीं किया है। इसका कारण यह है कि इन संस्थानों की सदस्यता अमेरिका को वे रणनीतिक और भू-राजनीतिक लाभ प्रदान करती है, जिनकी कीमत मागा आधार की आलोचना से कहीं अधिक है। ट्रंप का यह नजरिया बताता है कि उनके लिए वैश्विक राजनीति में कानून और संधियाँ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति ही एकमात्र निर्णायक कारक है। उनके लिए अब सड़क का नियम सिर्फ एक है या तो मेरी बात मानो, या बाहर का रास्ता देखो। यह दुनिया के नये युद्ध की आशंका की तरफ धकेल रहा है।