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अमेरिका ने ईरान के पास सैन्य मौजूदगी बढ़ायी

ईरान को दिये गये ट्रंप की चेतावनी के बीच सैन्य घेराबंदी

वाशिंगटन: मध्य पूर्व में युद्ध के बादल एक बार फिर गहरे हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल भंडार पर समझौता करने के लिए मात्र 10 से 15 दिनों की समय सीमा दी है। इस अल्टीमेटम के साथ ही अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को उस स्तर पर पहुँचा दिया है, जो 2003 के इराक युद्ध के बाद से नहीं देखा गया।

सैन्य खुफिया विश्लेषकों और फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में अमेरिका ने 120 से अधिक सैन्य विमान इस क्षेत्र में तैनात किए हैं। इनमें एफ-35 स्टील्थ फाइटर और एफ-22 एयर सुपीरियरिटी जेट है जो रडार की नजर में आए बिना हमला करने में सक्षम हैं। वहां पर ई 3 सेंट्री विमान हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली के रूप में काम करते हैं, जो पूरे युद्ध क्षेत्र पर नजर रखते हैं।

बी -2 स्टील्थ बॉम्बर: विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बी-2 बॉम्बर्स की हलचल बढ़ती है, तो यह जून 2025 में हुए ऑपरेशन मिडनाइट हैमर (ईरानी परमाणु स्थलों पर अमेरिकी हमला) जैसा दोबारा हमला होने का संकेत हो सकता है। समुद्र में दुनिया का सबसे बड़ा विमान वाहक पोत, यूएसएश जेराल्ड आर. फोर्ड, अब अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के साथ अरब सागर में शामिल होने जा रहा है।

हालांकि, इस सैन्य जमावड़े ने अमेरिका और ब्रिटेन के बीच एक कूटनीतिक दरार पैदा कर दी है। हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य बेस के उपयोग को लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने स्पष्ट किया है कि वे ईरान पर हमले के लिए ब्रिटिश संप्रभुता वाले ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देंगे, क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा। इसके जवाब में ट्रंप ने चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने के ब्रिटेन के फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को लिखे पत्र में ईरान ने कहा है कि वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन किसी भी अमेरिकी आक्रामकता का जवाब निर्णायक और आनुपातिक तरीके से दिया जाएगा। ईरान ने चेतावनी दी है कि किसी भी अनियंत्रित परिणाम के लिए पूरी तरह से अमेरिका जिम्मेदार होगा।